गांधी जयंती स्पेशल: बच्चों को कैसी शिक्षा देना चाहते थे गांधीजी, आज की पढ़ाई से कितना अलग था मॉडल?
Gandhi Jayanti Special: गांधीजी की ‘नई तालीम’ में बच्चों की पढ़ाई को काम, कौशल, अनुभव और जीवन से जोड़ने पर जोर था। जानिए 1937 की नई तालीम से लेकर आज की कौशल आधारित शिक्षा और नई शिक्षा नीति 2020 तक क्या बदला और क्या जुड़ा।
विस्तार
आज स्कूल की पढ़ाई का मतलब अक्सर किताब, कक्षा, परीक्षा और अंक से लगाया जाता है। लेकिन करीब नौ दशक पहले महात्मा गांधी शिक्षा को इससे कहीं व्यापक रूप में देखते थे। उनके शिक्षा विचारों से जुड़ी ‘नई तालीम’ में बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देने के बजाय काम, अनुभव, कौशल और जीवन से जोड़कर सीखने पर जोर था। 1937 में वर्धा में आयोजित शिक्षा सम्मेलन ने नई तालीम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गांधीजी की सोच में हाथ से काम करना केवल कोई अलग गतिविधि नहीं था, बल्कि सीखने का एक माध्यम था। आज जब शिक्षा में कौशल, अनुभव और व्यावहारिक सीखने की बात हो रही है, तब गांधीजी के शिक्षा विचारों को फिर समझना दिलचस्प हो जाता है।
नई तालीम की शुरुआत कैसे हुई?
गांधीजी की नई तालीम की दिशा 1937 के वर्धा शिक्षा सम्मेलन से जुड़ी है। यह सम्मेलन 22 और 23 अक्तूबर 1937 को वर्धा में गांधीजी की अध्यक्षता में हुआ था। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, इस सम्मेलन ने नई तालीम या नई शिक्षा के लिए रास्ता तैयार किया। यहां गांधीजी का जोर केवल किसी पेशे को सिखाने पर नहीं, बल्कि हस्तकौशल के माध्यम से शिक्षा देने पर था। सम्मेलन के बाद डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई, जिसे सम्मेलन में तय विचारों के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई। आगे चलकर यही विचार नई तालीम के रूप में देशभर में चर्चित हुए। गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों को उनके महत्वपूर्ण योगदानों में गिना जाता है।
पढ़ाई और काम साथ क्यों थे?
गांधीजी की शिक्षा सोच में काम और पढ़ाई को अलग-अलग देखने के बजाय उन्हें जोड़ने की कोशिश थी। इसका मतलब यह था कि बच्चा किसी वास्तविक गतिविधि या हस्तकौशल के माध्यम से भी सीख सकता है। उदाहरण के लिए किसी काम को करते हुए गणना, भाषा, माप या दूसरी अवधारणाओं को समझाया जा सकता है। गांधी हेरिटेज पोर्टल में वर्धा सम्मेलन के संदर्भ में बताया गया है कि गांधीजी का मुख्य जोर मैनुअल ट्रेनिंग के जरिए शिक्षा पर था। यानी हाथ से किया जाने वाला काम सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा था। इसका उद्देश्य बच्चों को केवल जानकारी याद कराना नहीं, बल्कि उन्हें वास्तविक जीवन से जोड़ना था। इसी वजह से नई तालीम को व्यावहारिक शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण विचार माना जाता है।
क्या रटने के बजाय अनुभव जरूरी था?
गांधीजी की शिक्षा सोच में अनुभव और गतिविधि की अहम भूमिका थी। इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि किताबों या सैद्धांतिक ज्ञान को महत्व नहीं दिया गया, बल्कि सीखने को जीवन और काम से जोड़ने पर जोर था। आज शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव आधारित सीखने की बात इसी तरह की व्यावहारिक प्रक्रिया को सामने लाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी सभी स्तरों पर अनुभव आधारित शिक्षा, हाथों से सीखने, कला आधारित और खेल आधारित शिक्षा को अपनाने की बात कही गई है। सरकार के शिक्षा संबंधी दस्तावेज में अनुभव आधारित शिक्षा को ‘करके सीखने’ से जोड़ा गया है। हालांकि गांधीजी की नई तालीम और आज की शिक्षा नीति अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों की अवधारणाएं हैं, इसलिए दोनों को पूरी तरह एक जैसा मानना सही नहीं होगा।
कौशल को पढ़ाई में क्यों जोड़ा गया?
गांधीजी की शिक्षा में कौशल का मतलब केवल किसी नौकरी के लिए प्रशिक्षण देना नहीं था। काम के जरिए सीखने का विचार बच्चों को आत्मनिर्भरता, व्यावहारिक ज्ञान और जीवन से जोड़ने से भी संबंधित था। आज स्कूली शिक्षा में भी कौशल और व्यावसायिक शिक्षा को अलग महत्व दिया जा रहा है। समग्र शिक्षा के तहत कक्षा 6 से 8 के विद्यार्थियों को व्यावसायिक कौशलों से परिचित कराने का प्रावधान है। वहीं कक्षा 9 से 12 तक व्यावसायिक पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य सामान्य शिक्षा के साथ व्यावसायिक शिक्षा को जोड़ना है। सरकारी योजना में विद्यार्थियों के लिए हाथों से प्रशिक्षण, क्षेत्रीय भ्रमण और काम के दौरान प्रशिक्षण जैसे प्रावधान भी शामिल हैं।
आज बच्चों को कौन से कौशल सिखाए जा रहे हैं?
आज कौशल आधारित शिक्षा का दायरा केवल पारंपरिक पढ़ाई तक सीमित नहीं है। समग्र शिक्षा के तहत छात्रों को अलग-अलग व्यावसायिक क्षेत्रों से परिचित कराने की व्यवस्था है। इसमें बढ़ईगीरी, बिजली का काम, धातु का काम, बागवानी और मिट्टी के बर्तन बनाना जैसे कौशलों का अनुभव शामिल किया गया है। कक्षा 6 से 8 के लिए ऐसे कौशलों से परिचित कराने की व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को अलग-अलग कामों और भविष्य के विकल्पों की जानकारी देना है। छात्रों को स्थानीय कारीगरों जैसे बढ़ई, माली, कुम्हार और कलाकारों के साथ सीखने का अवसर देने का भी प्रावधान है। इस तरह वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भी पढ़ाई को कुछ हद तक वास्तविक काम और स्थानीय कौशल से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
गांधीजी के मॉडल में शिक्षक की भूमिका क्या थी?
नई तालीम में बदलाव केवल बच्चों की पढ़ाई तक सीमित नहीं था। शिक्षक और पाठ्यक्रम भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा थे। 1937 के वर्धा सम्मेलन के बाद डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में समिति बनाई गई थी, जिसका काम सम्मेलन के प्रस्तावों के आधार पर एक व्यवस्थित पाठ्यक्रम तैयार करना था। इसका मतलब था कि नई तालीम के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं था कि बच्चों को काम के जरिए पढ़ाया जाए, बल्कि इसके लिए एक व्यवस्थित शिक्षण पद्धति और पाठ्यक्रम की भी जरूरत थी। गांधीजी की शिक्षा सोच में सीखने की प्रक्रिया को वास्तविक जीवन और गतिविधियों से जोड़ने के लिए शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इस मॉडल में शिक्षक केवल किताब पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया को दिशा देने वाला भी था।
क्या शिक्षा सिर्फ नौकरी के लिए थी?
गांधीजी की शिक्षा सोच को केवल रोजगार या नौकरी से जोड़कर देखना अधूरा होगा। नई तालीम में काम और कौशल महत्वपूर्ण थे, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल किसी पेशे के लिए तैयार करना नहीं था। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, वर्धा सम्मेलन में गांधीजी का जोर हस्तकौशल के माध्यम से शिक्षा पर था। इससे शिक्षा को जीवन और व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ने का विचार सामने आता है। आज भी शिक्षा को केवल नौकरी तक सीमित नहीं माना जाता। समग्र शिक्षा में व्यावसायिक शिक्षा के साथ संचार, आत्म-प्रबंधन, उद्यमिता और हरित कौशल जैसे रोजगार से जुड़े सामान्य कौशल भी शामिल हैं। इसलिए गांधीजी की सोच को समझते समय कौशल के साथ व्यक्तित्व, जिम्मेदारी और व्यावहारिक जीवन की तैयारी को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
NEP 2020 से क्या कनेक्शन है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा को अधिक अनुभव आधारित बनाने पर जोर दिया गया है। नीति के अनुसार सभी स्तरों पर हाथों से सीखने, कला आधारित, खेल आधारित और कहानी आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया जाना है। कक्षा 6 से 8 के विद्यार्थियों के लिए नीति में अलग-अलग व्यावसायिक शिल्पों का अनुभव देने और 10 दिन की ‘बैगलेस अवधि’ में स्थानीय व्यावसायिक विशेषज्ञों के साथ सीखने का प्रावधान भी रखा गया है। इनमें बढ़ई, माली, कुम्हार और कलाकार जैसे स्थानीय विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। नीति में कला, खेल और व्यावसायिक गतिविधियों को भी सीखने से जोड़ने की बात है। इसलिए गांधीजी की नई तालीम और NEP 2020 में करके सीखने और कौशल से जुड़ने जैसी कुछ समान दिशाएं दिखाई देती हैं, हालांकि दोनों की पूरी अवधारणा समान नहीं है।
आज की पढ़ाई कितनी अलग है?
गांधीजी की नई तालीम और आज की शिक्षा व्यवस्था में कुछ समान विचार दिखाई देते हैं, लेकिन दोनों को एक ही मॉडल नहीं कहा जा सकता। गांधीजी के मॉडल में हस्तकौशल और काम के जरिए सीखना केंद्रीय विचार था। आज की शिक्षा व्यवस्था में इसके साथ तकनीक, डिजिटल संसाधन, आधुनिक विषय, परियोजना कार्य और व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शामिल हैं। समग्र शिक्षा में कक्षा 9 से 12 के लिए व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को सामान्य शिक्षा के साथ जोड़ने का प्रावधान है। वहीं NEP 2020 सीखने को स्थानीय संदर्भ, कला, खेल, गतिविधियों और अनुभव से जोड़ने पर जोर देती है। इसलिए तुलना करने पर कहा जा सकता है कि आज की शिक्षा का ढांचा गांधीजी की नई तालीम से काफी व्यापक और आधुनिक है, लेकिन व्यावहारिक सीखने और कौशल पर जोर जैसी कुछ बातें दोनों में दिखाई देती हैं।
नई तालीम और आज की पढ़ाई में क्या फर्क है?
| गांधीजी की नई तालीम | आज की शिक्षा व्यवस्था |
|---|---|
| काम के जरिए सीखने पर जोर | अनुभव आधारित सीखने पर जोर |
| हस्तकौशल को शिक्षा से जोड़ना | व्यावसायिक और कौशल शिक्षा |
| शिक्षा को जीवन से जोड़ना | शिक्षा, कौशल और करियर से जुड़ाव |
| व्यावहारिक गतिविधियों पर जोर | परियोजना, प्रयोग और गतिविधियां |
| स्थानीय काम और अनुभव का महत्व | स्थानीय कौशल के साथ तकनीक का इस्तेमाल |
| शिक्षक की सक्रिय भूमिका | शिक्षक, तकनीक और नए शिक्षण तरीकों का इस्तेमाल |
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