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जयप्रकाश नारायण जयंती: एक आवाज और सड़कों पर उतर गए हजारों छात्र, कौन थे भारत रत्न 'लोकनायक' जेपी?

Sun, 11 Oct 2026 07:26 AM IST
शिवम तिवारी एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवम तिवारी Updated Sun, 11 Oct 2026 07:26 AM IST
सार
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Jayaprakash Narayan Birth Anniversary: जयप्रकाश नारायण जयंती पर जानिए भारत रत्न और लोकनायक जेपी की पूरी कहानी। बिहार के छात्र आंदोलन से संपूर्ण क्रांति के नारे तक, अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई से आपातकाल के विरोध तक, उनका जीवन कई ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा रहा। जानिए अमेरिका में पढ़ाई, प्रभावती देवी से विवाह, सर्वोदय आंदोलन, जनता पार्टी के गठन और लोकतंत्र की बहाली में उनकी अहम भूमिका के बारे में विस्तार से।

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Jayaprakash Narayan Birth Anniversary: Who Was Lok Nayak JP? From Sampoorna Kranti to Emergency Keywords
Jayaprakash Narayan Birth Anniversary - फोटो : AI Generated

विस्तार

सोचिए... एक ऐसा नेता जिसके पास न प्रधानमंत्री की कुर्सी थी, न कोई सरकारी पद और न ही सत्ता की ताकत, फिर भी उसकी एक आवाज पर हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए। बिहार से शुरू हुआ एक आंदोलन देखते ही देखते पूरे देश की राजनीति में भूचाल लाने लगा। भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी से परेशान युवाओं को ऐसा लगा, जैसे उनकी आवाज उठाने वाला कोई मिल गया हो। फिर आया साल 1974, जब एक नारे ने देश की सियासत को नई दिशा दे दी। इस नारे का नाम था ‘संपूर्ण क्रांति’। अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ने वाला यह नेता बाद में लोकतंत्र की रक्षा के लिए भी सरकार से टकरा गया। आपातकाल के दौर में भी उसने हार नहीं मानी। आखिर कौन था वह जयप्रकाश नारायण, जिसकी आवाज ने सत्ता की नींव हिला दी? आइए जानते हैं भारत रत्न से सम्मानित जेपी की पूरी कहानी।
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कौन थे जयप्रकाश नारायण?

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताबदियारा गांव में हुआ था। उनके पिता हरसूदयाल श्रीवास्तव और मां फूलरानी देवी थीं। सिताबदियारा गंगा और घाघरा नदियों के पास बसा गांव है, जिसका क्षेत्र बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़ा है। बचपन से ही पढ़ाई में रुचि रखने वाले जेपी आगे चलकर स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारक और जननेता बने। उनकी राजनीति का आधार केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाना था। 1974 में बिहार से शुरू हुए आंदोलन और आपातकाल के विरोध में उनकी भूमिका ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। इसी जनसमर्थन और संघर्ष के कारण उन्हें ‘लोकनायक’ कहा जाने लगा।
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अमेरिका की पढ़ाई ने कैसे बदली जेपी की सोच?

जयप्रकाश नारायण उच्च शिक्षा के लिए 1920 के दशक में अमेरिका गए। वहां उन्होंने अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। अमेरिका में रहते हुए उन्हें समाजवाद, मार्क्सवाद और आर्थिक असमानता जैसे विचारों को समझने का अवसर मिला। उन्होंने मेहनत करके अपनी पढ़ाई और जीवनयापन का खर्च उठाया। समाज में अमीर-गरीब के बीच अंतर और मजदूरों की स्थिति ने उनकी सोच को प्रभावित किया। 1929 में भारत लौटने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा को मजबूत करने लगे। 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में भी उनकी अहम भूमिका रही। इस तरह विदेश में हासिल अनुभव उनके राजनीतिक जीवन की बुनियाद बना।
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अंग्रेजों से टक्कर और जेल से भागने की कहानी क्या थी?

आजादी की लड़ाई के दौरान जेपी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले आंदोलनों में हिस्सा लिया और अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। जेपी भी हजारीबाग केंद्रीय जेल में बंद थे। नवंबर 1942 में वे पांच अन्य राजनीतिक बंदियों के साथ जेल की दीवार पार कर बाहर निकलने में सफल रहे। इसके बाद उन्होंने भूमिगत रहकर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। वे अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुप्त गतिविधियों और संपर्कों के जरिए काम करते रहे। सितंबर 1943 में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया।

आजादी के बाद जेपी ने सत्ता के बजाय समाज को क्यों चुना?

1947 में देश आजाद होने के बाद भी जेपी का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। वे समाज में गरीबी, असमानता और शोषण को बड़ी समस्याएं मानते थे। आजादी के बाद उन्होंने संसदीय राजनीति और समाजवादी आंदोलन में भूमिका निभाई, लेकिन धीरे-धीरे उनका झुकाव ऐसी सामाजिक व्यवस्था की ओर बढ़ा जिसमें बदलाव केवल सरकार के जरिए नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी से आए। 1950 के दशक में वे विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और सर्वोदय अभियान से जुड़े। भूदान आंदोलन में जमीन के मालिकों से भूमिहीन लोगों के लिए जमीन दान करने की अपील की जाती थी। जेपी का मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। आम लोगों को सामाजिक और आर्थिक फैसलों में भी भागीदारी मिलनी चाहिए।

 बिहार के छात्र आंदोलन से कैसे उठा संपूर्ण क्रांति का नारा?

1970 के दशक की शुरुआत में देश महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। गुजरात में छात्र आंदोलन के बाद बिहार में भी छात्रों ने व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई। 1974 में बिहार के छात्र नेताओं ने जयप्रकाश नारायण से आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की। शुरुआत में जेपी सामाजिक जीवन में सक्रिय थे, लेकिन छात्रों की मांगों और हालात ने उन्हें दोबारा जनआंदोलन के केंद्र में ला दिया। उन्होंने आंदोलन को केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रखा। उनका कहना था कि व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत है। जून 1974 में पटना के गांधी मैदान में उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। इस नारे ने छात्र आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई और बड़ी संख्या में युवा इससे जुड़ने लगे।

 आखिर संपूर्ण क्रांति का मतलब क्या था?

संपूर्ण क्रांति का अर्थ केवल किसी सरकार को हटाना या चुनाव जीतना नहीं था। जेपी चाहते थे कि राजनीतिक व्यवस्था के साथ सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और नैतिक जीवन में भी सुधार हो। उनका मानना था कि भ्रष्टाचार और अन्याय जैसी समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब नागरिक खुद बदलाव की प्रक्रिया में भाग लें। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे अपनी पढ़ाई और भविष्य के साथ समाज की समस्याओं पर भी ध्यान दें। आंदोलन के दौरान शांतिपूर्ण जनभागीदारी, जवाबदेही और लोकतांत्रिक सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। जेपी ने युवाओं को व्यवस्था बदलने की ताकत के रूप में देखा। हालांकि आंदोलन के तरीकों और मांगों पर राजनीतिक मतभेद भी थे, लेकिन इसने तत्कालीन राजनीति और छात्र संगठनों पर गहरा प्रभाव डाला।

 इंदिरा गांधी की सरकार से जेपी का टकराव क्यों हुआ?

संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के बीच टकराव बढ़ता गया। जेपी भ्रष्टाचार, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे थे। वे चाहते थे कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह रहें और व्यवस्था में सुधार हो। दूसरी ओर, सरकार के समर्थकों ने आंदोलन की मांगों और उसके तरीकों पर सवाल उठाए। 1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव से जुड़े मामले में उनके निर्वाचन को अमान्य घोषित किया। इसके बाद राजनीतिक संकट और गहरा गया। जेपी ने सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज किया और लोकतांत्रिक तरीकों से बदलाव की मांग की। इस पूरे घटनाक्रम ने देश को एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक टकराव की ओर धकेल दिया।

 आपातकाल में जेपी के साथ क्या हुआ?

25 जून 1975 की रात देश में आपातकाल की घोषणा की गई। इसके बाद विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों के खिलाफ कार्रवाई हुई। जयप्रकाश नारायण भी गिरफ्तार कर लिए गए। आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध, प्रेस पर सेंसरशिप और राजनीतिक विरोध पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए गए। जेपी ने इन परिस्थितियों को लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती माना और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग की। उनकी गिरफ्तारी के बावजूद उनके विचार और आंदोलन देश के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने रहे। इस दौर में कई विपक्षी नेता जेल में बंद रहे और अनेक राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगी। जेपी की भूमिका केवल सरकार का विरोध करने तक सीमित नहीं थी; वे लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और जवाबदेही को बहाल करने की मांग भी उठा रहे थे।

 विपक्ष को एकजुट करने में जेपी ने क्या भूमिका निभाई?

आपातकाल के दौरान और उसके बाद जयप्रकाश नारायण ने अलग-अलग विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने में अहम भूमिका निभाई। कांग्रेस के विरोध में सक्रिय समाजवादी, जनसंघ और अन्य विपक्षी समूहों के बीच वैचारिक मतभेद थे, लेकिन जेपी ने लोकतंत्र की बहाली के मुद्दे पर एकजुट होने की अपील की। इसी प्रयास ने जनता पार्टी के गठन का रास्ता तैयार किया। 1977 में आपातकाल हटने के बाद लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी ने जीत हासिल की और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। यह भारतीय राजनीति का बड़ा बदलाव था, क्योंकि आजादी के बाद पहली बार केंद्र में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। जेपी ने इस राजनीतिक एकजुटता को दिशा देने में योगदान दिया, हालांकि वे स्वयं चुनाव लड़कर किसी सरकारी पद पर नहीं पहुंचे।

 प्रधानमंत्री बनने का मौका होते हुए भी जेपी सत्ता से दूर क्यों रहे?

जयप्रकाश नारायण की सबसे खास बात यह थी कि वे राजनीतिक बदलाव के केंद्र में रहे, लेकिन खुद सत्ता के पद पर बैठने की कोशिश नहीं की। 1977 में जनता पार्टी की जीत के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जेपी ने सरकार बनाने की प्रक्रिया में विपक्ष को एकजुट करने और लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने पर जोर दिया। वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से भी जूझ रहे थे। उनकी प्राथमिकता सरकार का पद हासिल करना नहीं, बल्कि देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना थी। हालांकि उनके सत्ता से दूर रहने के पीछे केवल एक कारण नहीं था, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनकी पहचान ऐसे नेता की बनी जिसने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल व्यक्तिगत पद पाने के बजाय व्यापक बदलाव के लिए किया।

 प्रभावती देवी के साथ कैसा था जेपी का निजी जीवन?

जयप्रकाश नारायण का निजी जीवन भी उनके विचारों और सामाजिक प्रतिबद्धताओं से जुड़ा रहा। वर्ष 1920 में उनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ। प्रभावती देवी स्वतंत्रता आंदोलन और गांधीवादी विचारों से प्रभावित थीं। विवाह के बाद जब जेपी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, तब प्रभावती भारत में रहीं और गांधीजी के आश्रम से जुड़ीं। दोनों के जीवन में व्यक्तिगत रिश्ते के साथ देशसेवा और सामाजिक कार्यों को भी महत्वपूर्ण स्थान मिला। जेपी ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा राजनीतिक आंदोलनों, जेल और सामाजिक अभियानों में बिताया। उनके जीवन को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उन्होंने निजी महत्वाकांक्षाओं के बजाय सार्वजनिक मुद्दों को प्राथमिकता दी। प्रभावती देवी का निधन 1973 में हुआ, जो जेपी के जीवन का एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत पड़ाव था।

सर्वोदय और सामाजिक बदलाव को लेकर क्या थे जेपी के विचार?

जेपी का मानना था कि समाज में वास्तविक बदलाव केवल कानून बनाने या सरकार बदलने से नहीं आएगा। इसके लिए लोगों की सोच, सामाजिक व्यवहार और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार जरूरी है। इसी सोच ने उन्हें सर्वोदय आंदोलन के करीब लाया। सर्वोदय का व्यापक अर्थ सभी का कल्याण है। इस विचारधारा में अहिंसा, सहयोग, सामाजिक समानता और समुदाय की भागीदारी पर जोर दिया जाता है। जेपी ने भ्रष्टाचार और सत्ता के केंद्रीकरण को लोकतंत्र के सामने बड़ी चुनौतियों के रूप में देखा। वे चाहते थे कि गांव और स्थानीय समुदाय अपने विकास से जुड़े फैसलों में अधिक भूमिका निभाएं। उनकी संपूर्ण क्रांति की अवधारणा में राजनीतिक सुधार के साथ सामाजिक और आर्थिक बदलाव भी शामिल थे। यही वजह है कि उनके विचार आज भी लोकतंत्र और नागरिक जिम्मेदारी पर होने वाली चर्चाओं में सामने आते हैं।

 भारत रत्न कब मिला और जेपी का निधन कब हुआ?

जयप्रकाश नारायण का निधन 8 अक्टूबर 1979 को पटना में हुआ। उस समय वे भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों की एक महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में पहचाने जाते थे। उनके योगदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1999 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया। यह देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। उनकी स्मृति में कई संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों के नाम रखे गए हैं। दिल्ली स्थित लोकनायक जयप्रकाश नारायण राष्ट्रीय अपराध विज्ञान एवं न्यायालयिक विज्ञान संस्थान भी उनके नाम से जुड़ा है। बिहार में भी उनके जीवन और विचारों से जुड़े स्मारक तथा संस्थान उनकी विरासत को याद करते हैं। उनके जीवन की कहानी स्वतंत्रता संग्राम, समाजवादी विचारधारा, जनआंदोलन और लोकतंत्र की बहाली के संघर्ष से जुड़ी हुई है।

आज की पीढ़ी के लिए क्या संदेश छोड़ गए लोकनायक जेपी?

जयप्रकाश नारायण की जयंती केवल एक स्वतंत्रता सेनानी को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका पर विचार करने का मौका भी है। उनका जीवन बताता है कि छात्र और आम नागरिक भी सार्वजनिक मुद्दों पर आवाज उठा सकते हैं। साथ ही, किसी भी आंदोलन की दिशा, उसके तरीके और उसके परिणामों को समझना भी जरूरी है। जेपी ने भ्रष्टाचार, जवाबदेही, सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों को अपने सार्वजनिक जीवन में महत्व दिया। उनकी संपूर्ण क्रांति का विचार आज भी इस सवाल से जुड़ता है कि क्या बदलाव केवल सरकार बदलने से आता है या समाज और संस्थाओं में सुधार भी जरूरी है। उनकी विरासत को समझने का अर्थ उनके हर विचार से सहमत होना नहीं, बल्कि इतिहास से सीखना और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीरता से विचार करना है। यही लोकनायक जेपी की जयंती का व्यापक संदेश है।
 
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