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विचार: ‘तीसरी आंख’ को मिला हक और सम्मान

Wed, 14 Oct 2026 04:57 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र हरि मंगल सिंह
हरि मंगल सिंह Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 14 Oct 2026 04:57 PM IST
सार
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ग्राम प्रहरी का पद कोई नई व्यवस्था नहीं है। इसका जन्म 1873 के उत्तर-पश्चिमी प्रांत ग्राम पुलिस अधिनियम के तहत हुआ था, जब ब्रिटिश हुकूमत ने इसे नियमित पुलिस के विस्तार के रूप में खड़ा किया। 

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UP Government Gram Prahari Rights and Respect Opinion Article news in hindi
जनसभा में ग्राम प्रहरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रात का सन्नाटा जब गांव की गलियों में उतरता है, तब कहीं दूर से आती लाठी की ठक-ठक और एक सीटी की आवाज भरोसा दे जाती है कि सब कुछ ठीक है। उत्तर प्रदेश के किसी भी गांव में यह आवाज आज भी अनुशासन और सतर्कता का पर्याय है। सिर पर पगड़ी, हाथ में लाठी और कंधों पर पूरे गांव की सुरक्षा का भार लिए जो व्यक्ति गलियों में घूमता है, उसे हम बचपन से चौकीदार कहते आए हैं। पर सबसे अंतिम पायदान पर खड़े इस सिपाही की सुध दशकों तक नहीं ली गई। इस उपेक्षा को तोड़ने की ठोस पहल अगर किसी ने की, तो वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार है, जिसने पहले इस पद को नए नाम के साथ गरिमा दी और अब उसके मानदेय में दूसरी बार बड़ी बढ़ोतरी का फैसला किया है।
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ग्राम प्रहरी का पद कोई नई व्यवस्था नहीं है। इसका जन्म 1873 के उत्तर-पश्चिमी प्रांत ग्राम पुलिस अधिनियम के तहत हुआ था, जब ब्रिटिश हुकूमत ने इसे नियमित पुलिस के विस्तार के रूप में खड़ा किया। उस दौर में गांव की कानून-व्यवस्था का असली आधार यही चौकीदार थे। उनकी वर्दी का रौब था, उनकी बात का वजन था और थानेदार पूरे गांव की खबर के लिए इन्हीं पर निर्भर रहता था। आजादी मिली, सरकारें बदलीं, पर यह व्यवस्था जस की तस चलती रही। जिम्मेदारी पीढ़ी दर पीढ़ी बेटे को सौंपी जाती रही और कई जगह तो तत्कालीन थानेदारों ने किसी विश्वासपात्र के हाथ में लाठी थमा दी और वही परंपरा बन गई। कहने का आशय यह कि जिस व्यक्ति पर गांव की सुरक्षा का पहला दारोमदार था, उसकी हैसियत और हालत पर किसी ने गंभीरता से विचार ही नहीं किया।
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यह चुप्पी 5 जनवरी 2018 को टूटी। वाराणसी पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ग्राम चौकीदारों को एक नया नाम दिया- ग्राम प्रहरी। यह महज शब्दों का हेरफेर नहीं था। चौकीदार शब्द में पहरेदारी का भाव था, तो प्रहरी में रक्षा और गौरव दोनों का समावेश है। किसी व्यक्ति को जिस नाम से पुकारा जाता है, उसी से समाज में उसकी जगह तय होती है। नाम बदलकर सरकार ने यह संदेश दिया कि गांव की रखवाली करने वाला केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि व्यवस्था का सम्मानित स्तंभ है। उसी वर्ष इन ग्राम प्रहरियों का मानदेय 1500 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये किया गया। यानी, सम्मान की बात केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रही, उसे जेब तक पहुंचाने का प्रयास भी हुआ और अब योगी सरकार ने इस दिशा में एक कदम और बढ़ाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रहरियों के मानदेय में एक हजार रुपये की और वृद्धि की है। अब उन्हें 2500 के बजाय 3500 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 13 अक्टूबर को बरेली पुलिस लाइन में आयोजित विशेष कार्यक्रम में प्रदेश के लगभग 68 हजार ग्राम प्रहरियों को सम्मानित करने के साथ ही उनके मानदेय में वृद्धि का एलान किया। यह 40 प्रतिशत की सीधी बढ़ोतरी है और सालभर में हर प्रहरी को 12,000 रुपये का अतिरिक्त लाभ होगा। सरकारी खजाने पर इससे प्रतिमाह लगभग 7 करोड़ और सालाना करीब 84 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा, जिसकी व्यवस्था अनुपूरक बजट में की जाएगी। दीपावली से ठीक पहले आया यह निर्णय उन घरों के लिए सचमुच त्योहार की सौगात है, जहां दीये बहुत सीमित साधनों में जलते रहे हैं। यही नहीं, मुख्यमंत्री ने ग्राम प्रहरियों व उनके परिवारों को जल्द सालाना पांच लाख रुपये तक कैशलेस चिकित्सा कवर दिए जाने की बात कर स्पष्ट संदेश दिया कि अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

प्रहरी ग्राम सुरक्षा की मजबूत कड़ी हैं और जब किसी मुख्यमंत्री के मन में उनके प्रति सम्मान का भाव दिखाई देता है तो उनमें आत्म गौरव बढ़ जाता है। वे गांव और थाने के बीच का सेतु हैं और गृह विभाग के सूचना तंत्र की सबसे पहली और सबसे मजबूत कड़ी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इनके काम को पुलिस की तीसरी आंख कहा है। गांव में किसी अजनबी की आमद हो, कोई संदिग्ध गतिविधि दिखे, जमीन को लेकर दो पक्षों में तनातनी हो, चोरी हो या किसी बड़ी वारदात की आशंका, सबसे पहले यही थाने तक खबर पहुंचाते हैं। आपदा हो, चुनाव हो, त्योहारों की भीड़ हो या शांति समिति की बैठक, इनकी मौजूदगी अनिवार्य है। ठंड हो, बारिश हो या आंधी, जब पूरा गांव सोता है तब भी प्रहरी जागता है।
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प्रहरियों का मानदेय बढ़ाने का फैसला योगी सरकार की सुसंगत सोच का हिस्सा है। पिछले कुछ महीनों में सरकार ने मानदेय पर काम करने वाले लगभग हर वर्ग को राहत दी है। परिषदीय विद्यालयों में मिड-डे मील बनाने वाली साढ़े तीन लाख से अधिक रसोइयों का मानदेय 2000 से बढ़ाकर 3000 रुपये किया गया। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय भी 8000 से 12000 रुपये और सहायिकाओं का 4000 से 6000 रुपये हुआ। 57 हजार पंचायत सहायकों को 6000 की जगह 9000 रुपये मिलेंगे और पीआरडी जवानों का दैनिक भत्ता 500 से बढ़ाकर 600 रुपये किया गया। जो लोग व्यवस्था की सबसे निचली कड़ी पर खड़े होकर काम करते हैं, उन्हें एक के बाद एक राहत देना इस सरकार की प्राथमिकताओं का साफ संकेत है। ग्राम प्रहरियों की बारी इसी कतार में आई है और पूरी गंभीरता के साथ आई है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक हरि मंगल सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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