बिलासपुर: हिमाचल की गोल्डन महाशीर के बीज की पहली खेप पश्चिम बंगाल भेजी, 2000 मछलियों से शुरू हुआ नया कारोबार
हिमाचल प्रदेश की दुर्लभ गोल्डन महाशीर मछली अब दूसरे राज्यों में भी पहुंचने लगी है। मछियाल स्थित राष्ट्रीय महाशीर फार्म में तैयार 2000 फिंगरलिंग्स की पहली खेप पश्चिम बंगाल भेजी गई है। शुरुआती परीक्षण सफल रहने पर विभाग 10 हजार मछलियों की अगली खेप भी भेजेगा।
विस्तार
हिमाचल प्रदेश की नदियों और जलाशयों में पाई जाने वाली दुर्लभ गोल्डन महाशीर मछली अब दूसरे राज्यों के बाजारों तक पहुंचने लगी है। प्रदेश के मत्स्य विभाग ने पहली बार इस मछली की फिंगरलिंग्स (मछली बीज की अंगुलिकाएं) की खेप पश्चिम बंगाल भेजकर अंतरराज्यीय स्तर पर नई पहल की है।
मंडी जिले के मछियाल स्थित राष्ट्रीय महाशीर फार्म में तैयार की गईं 2000 गोल्डन महाशीर फिंगरलिंग्स की पहली खेप पश्चिम बंगाल पहुंचाई गई है। इस पहल से हिमाचल में तैयार होने वाले मछली बीज को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ी हैं। विभाग ने फिलहाल इस खेप को पायलट परीक्षण के रूप में भेजा है। इसके माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि लंबी दूरी के परिवहन के दौरान कितनी मछलियां जीवित रहती हैं और दूसरे राज्य के वातावरण में खुद को किस तरह अनुकूल बनाती हैं।
मत्स्य विभाग की इस पहल का अगला चरण शुरुआती परीक्षण के परिणामों पर निर्भर करेगा। पश्चिम बंगाल भेजी गई पहली खेप में मछलियों के जीवित रहने की दर और वहां की जलवायु के अनुकूलन का आकलन किया जाएगा। यदि परीक्षण के नतीजे संतोषजनक रहते हैं तो विभाग दूसरे चरण में 10 हजार गोल्डन महाशीर फिंगरलिंग्स की खेप पश्चिम बंगाल भेजेगा। इससे हिमाचल में मछली बीज उत्पादन के साथ-साथ दूसरे राज्यों में इसकी आपूर्ति का नया रास्ता खुल सकता है।
गोल्डन महाशीर हिमाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण और दुर्लभ मीठे पानी की मछली प्रजातियों में शामिल है। नदियों और जलाशयों में इसकी मौजूदगी प्रदेश की जलीय जैव विविधता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। मछियाल स्थित राष्ट्रीय महाशीर फार्म में इस प्रजाति के बीज तैयार किए जा रहे हैं। अब पहली बार इसकी फिंगरलिंग्स दूसरे राज्य में भेजे जाने से हिमाचल के मत्स्य पालन क्षेत्र को अंतरराज्यीय बाजार से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में गोल्डन महाशीर के बीज की आपूर्ति दूसरे राज्यों तक बढ़ाई जा सकती है। इससे प्रदेश के मत्स्य विभाग के लिए नई संभावनाएं विकसित होंगी और इस दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
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