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BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की कुर्सी पर संकट?: 12 साल के कार्यकाल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, चुनाव की मांग

Sat, 22 Aug 2026 12:10 PM IST
प्रशांत तिवारी एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली Published by: प्रशांत तिवारी Updated Sat, 22 Aug 2026 12:10 PM IST
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BCI Chairman Manan Kumar Mishra position in jeopardy tenure challenged in Supreme Court demand for elections
मनन कुमार मिश्र - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के लंबे कार्यकाल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में BCI नियमों के तहत चेयरमैन के दो साल के कार्यकाल का हवाला देते हुए अप्रैल 2025 की उस गजट अधिसूचना को रद्द करने की मांग की गई है, जिसमें कथित तौर पर कार्यकाल 2030 तक बढ़ाया गया। याचिकाकर्ता ने मिश्रा को पद से हटाने, नए चुनाव कराने, चेयरमैन के कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने और BCI के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र जांच व ऑडिट कराने की भी मांग की है। याचिका में उनके राजनीतिक जुड़ाव के संदर्भ में BCI की संस्थागत निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर भी चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता योगमाया एमजी ने मिश्रा के लगातार कार्यकाल की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि BCI नियमों का नियम 12(2) चेयरमैन के कार्यकाल की अवधि दो साल निर्धारित करता है।

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2030 तक कार्यकाल बढ़ाने वाली अधिसूचना पर सवाल
याचिका में अप्रैल 2025 में जारी उस गजट अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है, जिसके जरिए कथित तौर पर मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि BCI को नियंत्रित करने वाले वैधानिक नियमों के विपरीत किसी प्रशासनिक अधिसूचना के जरिए चेयरमैन का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जा सकता।
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BCI नियमों में दो साल का कार्यकाल
अधिवक्ता दीपक प्रकाश के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि BCI नियमों का नियम 12(2) चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल का कार्यकाल तय करता है। यह कार्यकाल सदस्यता समाप्त होने तक या दो साल की अवधि तक, जो भी पहले हो, लागू रहता है। याचिका में कहा गया है कि प्रशासनिक स्तर पर जारी कोई अधिसूचना नियमों में तय अवधि से आगे कार्यकाल बढ़ाने का आधार नहीं बन सकती।

21 अप्रैल 2025 की गजट अधिसूचना रद्द करने की मांग
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से 21 अप्रैल 2025 की गजट अधिसूचना को रद्द करने और BCI को उसे वापस लेने या निरस्त करने का निर्देश देने की मांग की है।

एक ही व्यक्ति के हाथ में लंबे समय से पद रहने पर चिंता
याचिका में संस्थागत संतुलन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि नियम 12(2) चेयरमैन के लिए दो साल का कार्यकाल निर्धारित करता है, लेकिन लगातार दोबारा चुने जाने पर कोई प्रभावी सीमा तय नहीं है। इसके चलते करीब 12 वर्षों से चेयरमैन का पद एक ही व्यक्ति के पास बना हुआ है। याचिका में कहा गया है कि इतनी लंबी अवधि तक किसी एक व्यक्ति के हाथ में पद का बने रहना पहली नजर में उस प्रतिनिधिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है, जिसकी परिकल्पना अधिवक्ता अधिनियम के तहत की गई है। याचिका के मुताबिक, अधिनियम की धारा 4(1)(c) के तहत प्रत्येक राज्य बार काउंसिल BCI के गठन में योगदान देती है। ऐसे में पूरे कानूनी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राष्ट्रीय संस्था का सर्वोच्च पद अनिश्चितकाल तक एक व्यक्ति या किसी सीमित क्षेत्रीय समूह के पास नहीं रहना चाहिए।

मनन कुमार मिश्रा को हटाने और नए चुनाव की मांग
याचिका में अन्य राहतों के साथ मनन कुमार मिश्रा को चेयरमैन पद से हटाने और स्वतंत्र निगरानी में तय समय सीमा के भीतर नए चुनाव कराने की मांग की गई है।

चेयरमैन के कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने की मांग
याचिकाकर्ता ने BCI चेयरमैन के रूप में किसी व्यक्ति के कुल कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने की भी मांग की है। इसके साथ ही पद पर राज्यों और क्षेत्रों के बीच बारी-बारी से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए रोटेशन व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया गया है। याचिका में कूलिंग-ऑफ अवधि और पारदर्शी रोटेशन प्रणाली की भी मांग की गई है, ताकि अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को BCI का नेतृत्व करने का अवसर मिल सके।

पूर्व जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति बनाने की मांग
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने का आग्रह किया है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या किसी हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को सौंपने का प्रस्ताव है। समिति की सहायता CAG द्वारा नामित ऑडिटर के साथ वित्तीय और तकनीकी विशेषज्ञों से कराने की मांग की गई है।

BCI ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की जांच की मांग
याचिका में BCI ट्रस्ट 'PEARL-FIRST' के कामकाज और वित्तीय मामलों के साथ-साथ ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन से जुड़े वित्तीय मामलों पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने इन मामलों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।

फंड और वित्तीय लेनदेन के ऑडिट की मांग
याचिका में वैधानिक फंड, ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन से होने वाली आय, संस्थागत प्राप्तियों, ट्रस्ट के वित्तीय मामलों, वेंडर कॉन्ट्रैक्ट और संबंधित पक्षों के साथ होने वाले लेनदेन का तय समय सीमा में ऑडिट कराने की मांग की गई है।

हटाए जाने की स्थिति में अंतरिम व्यवस्था का प्रस्ताव
याचिकाकर्ता ने अंतरिम उपाय के तौर पर एक स्वतंत्र प्रशासनिक समिति गठित करने का प्रस्ताव भी रखा है। यदि सुप्रीम कोर्ट मनन कुमार मिश्रा को चेयरमैन पद से हटाने का निर्देश देता है, तो यह समिति BCI के कामकाज की निगरानी कर सकती है।

2012 से चेयरमैन पद से जुड़ा है कार्यकाल
याचिका में मनन कुमार मिश्रा के BCI चेयरमैन के रूप में कार्यकाल का जिक्र 2012 से किया गया है। इसमें कहा गया है कि उन्होंने 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ा था, लेकिन उसी साल नवंबर में दोबारा चेयरमैन बन गए और तब से लगातार इस पद पर बने हुए हैं। मार्च 2025 में वह एक बार फिर निर्विरोध चेयरमैन चुने गए। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह BCI के शीर्ष पद पर उनका लगातार सातवां कार्यकाल है।

BJP से राज्यसभा सदस्य बनने का भी जिक्र
याचिका में चेयरमैन पद पर रहते हुए मनन कुमार मिश्रा की राजनीतिक गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें 2024 में BJP द्वारा नामित किए जाने के बाद उनके राज्यसभा सदस्य बनने का जिक्र किया गया है।


BCI की निष्पक्षता पर चिंता
याचिकाकर्ता ने यह नहीं कहा है कि केवल राजनीतिक संबद्धता के आधार पर मनन कुमार मिश्रा BCI चेयरमैन पद के लिए अयोग्य हो जाते हैं। हालांकि, याचिका में तर्क दिया गया है कि राजनीतिक पद से उनका जुड़ाव और देश की कानूनी पेशे को नियंत्रित करने वाली वैधानिक संस्था के प्रमुख के रूप में उनकी भूमिका, BCI की संस्थागत निष्पक्षता और उसकी स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े करती है।

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याचिका में संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
PIL में कहा गया है कि याचिकाकर्ता किसी व्यक्ति को केवल राजनीतिक संबद्धता या व्यक्तिगत असहमति के कारण पद से हटाने की मांग नहीं कर रहा है। याचिका का उद्देश्य अदालत से किसी वैधानिक प्राधिकरण के निर्णय की जगह अपना निर्णय रखने का आग्रह करना भी नहीं है। इसके बजाय चुनौती कथित संरचनात्मक अवैधता, संस्थागत नियंत्रण के कथित केंद्रीकरण, वैधानिक शक्तियों के लंबे समय तक एक ही जगह केंद्रित रहने, कार्यकाल और चुनावों से जुड़े अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन, नियामक शक्तियों के कथित मनमाने इस्तेमाल, पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी तथा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में परिकल्पित प्रतिनिधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने में कथित विफलता को लेकर है।

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