{"_id":"6aa5e2278aafc75a4a026853","slug":"hindi-language-development-literature-culture-identity-2026-09-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिंदी का बदलता रूप: बहती नदी से ठहरा तालाब क्यों बन रही भाषा, दुराग्रहों से कैसे बचाएं इसकी ऊर्जा?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
हिंदी का बदलता रूप: बहती नदी से ठहरा तालाब क्यों बन रही भाषा, दुराग्रहों से कैसे बचाएं इसकी ऊर्जा?
Sun, 13 Sep 2026 05:07 AM IST
राकेश कुमार
वीर सिंह, पूर्व प्रोफेसर एमेरिटस जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
वीर सिंह, पूर्व प्रोफेसर एमेरिटस जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
Published by: राकेश कुमार
Updated Sun, 13 Sep 2026 05:07 AM IST
दुराग्रहों ने हिंदी को एक ठहरा तालाब-सा बना दिया है, जहां हमारी भाषा मलिन-से शब्दों से
प्रदूषित होकर धीरे-धीरे अपनी गतिज ऊर्जा खोती जा रही है।
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हिंदी पर गर्व करें
- फोटो : Amar ujala
विस्तार
सोशल मीडिया का वर्चस्व बढ़ जाने से हिंदी साहित्य से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है। हिंदी पुस्तकें ऐसे साथ छोड़ रही हैं, जैसे आत्मा शरीर का। ऐसे में अगर सबसे अधिक हिंदी कहीं पढ़ी जाती है, तो वे हैं हिंदी दैनिक। लेकिन जैसी हिंदी वहां पांव फैलाती जा रही है, उसे कैसे देखें? क्या मात्र लिपि देवनागरी रह जाएगी, भाषा कुछ और होगी?
पहले मुगलों की और बाद में अंग्रेजों की परतंत्रता झेलते भारत में ऐसे लेखक और कवि अवतरित होते रहे, जिन्होंने हिंदी साहित्य के उत्कृष्टतम सृजन के साथ-साथ उसका प्रचार-प्रसार किया, तब जाकर एक राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा हो सकी। देश के विभाजन से पूर्व ही एक विमर्श लोकप्रिय कर दिया गया- तहजीब की भाषा। जब हम किसी एक भाषा को ‘तहजीब की भाषा’ कहेंगे, तब अन्य भाषा की महत्ता कैसे आंकेंगे? अब देख लीजिए, बॉलीवुड से लेकर दैनिकों तक की भाषा कैसी होती जा रही है। भारत से पृथक हुए देश ने जिसे कृत्रिम रूप से राष्ट्रभाषा बनाया, वहां पंजाबी, सिंधी, बलोच और मोहनजोदड़ो काल तक की अनेक भाषाओं का अस्तित्व कैसा हो गया?
हिंदी के विकास का दायित्व हमारे यहां जिनके कंधों पर है, उन्हें पंत, निराला, महादेवी, प्रसाद, हरिऔध या दिनकर जैसों की हिंदी क्यों नहीं चाहिए? क्या सचमुच सरलता के नाम पर भाषा को प्रदूषित किया जाना चाहिए? मानव सभ्यताओं के उत्थान-पतन की कहानियां इतिहास के भाल पर उकेरी पड़ी हैं। इन सभ्यताओं के मूल में उनकी संस्कृतियां हैं और उनकी मौलिक भाषाओं में उनकी संस्कृतियों की सुगंध बसती है। संस्कृति किसी सभ्यता का पर्यावरण होती है और संस्कृति का पर्यावरण उसकी भाषा। जैसे जीव स्वस्थ पर्यावरण में पलते-बढ़ते हैं, उसी तरह संस्कृति भी एक संबलमय भाषा से पुष्पित-पल्लवित होती है, तथा अपनी भाषा से स्पंदित संस्कृति एक जीवंत, सुदृढ़, विकासवादी और चिरंजीवी सभ्यता को पोसती है।
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कोई भी सभ्यता, संस्कृति और भाषा संयुक्त रूप से एक एक भौगोलिक सीमाओं में पनपती हैं और इस भूगोल की मिट्टी, जल, वायु, और जलवायु की पृष्ठभूमि में अपना विकास करती हैं। सभ्यता-संस्कृति-भाषा एक धुरी है, जिसके सहारे मानवता हमारे ग्रह के विभिन्न भूगोलों में खिलती रही है। बाहरी आक्रमणों और आंतरिक कारकों से जब-जब यह धुरी टूटी है, तब-तब किसी सभ्यता का अंत हुआ है। किसी सभ्यता के टूटने और अंततः विलुप्त होने की प्रक्रिया उसकी भाषा के क्रमशः क्षरण से प्रारंभ होती है। भाषा सीधे या एक झटके में नहीं बिफरती। इसे पहले दोगला बनाया जाता है। दोगला बनकर इसके अर्थ बदलने लगते हैं और जिस संस्कृति को वह भाषा पोषित करती थी, शनैः शनैः उसकी भी सांसें उखड़ने लगती हैं और कालांतर में सभ्यता-संस्कृति-भाषा की सशक्त धुरी टूटकर सभ्यता को ही भूगोल से उखाड़कर फेंक देती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा से लेकर मिस्र, इराक, ईरान, एवं अफगानिस्तान तक और ऑस्ट्रेलिया से लेकर न्यूजीलैंड तक सभी देश वहां की मौलिक सभ्यताओं को रौंद कर अस्तित्व में आए हैं। अब वहां न मूल संस्कृति की कोई पहचान बची है, न उसकी भाषा। बाहरी लोग वहां नियंत्रण के लिए सैनिकों और व्यापारियों को लेकर गए थे। उनके साथ उनकी भाषा और विदेशी संस्कृति भी गईं। उनका नियंत्रण होने के बाद धीरे-धीरे राज करने वालों की भाषा के दबाव में स्थानीय भाषा संकर भाषा बनने लगी, स्थानीय संस्कृति पर ग्रहण लगने लगा और देखते ही देखते सहस्राब्दियों लंबी विकास यात्रा में पकी जीती-जागती भाषाई सभ्यताएं भी लुप्त हो गईं।
भाषा एक कला भी है और एक अद्भुत ऊर्जा भी। यह लिखित रूप में एक कला है। भाषा जब ध्वनि का रूप लेती है, जैसे बोलने-सुनने के रूप में, तो वह एक ऊर्जा है। वैज्ञानिक परिभाषा में ध्वनि एक ऊर्जा रूप है, प्रकाश की तरह। कलाओं का सौंदर्य और ऊर्जा का सकारात्मक प्रभाव मानव समाजों के लिए कितना आवश्यक है, यह हम जानते ही हैं। किसी भी भूगोल की मौलिक भाषा कलाओं के सौंदर्य और ऊर्जाओं की सकारात्मकता का योग है। ध्वनि एक ऐसी ऊर्जा है जिसका मानव मन पर गहरा प्रभाव अवश्यंभावी है। गीत सुनिए, कविता गायन सुनिए, भजन सुनिए, उन ध्वनि-ऊर्जाओं का अद्भुत प्रभाव मानव मन को तरंगित करता है। यह ऊर्जा हिंदी साहित्य की आत्मा है। देश में जितनी क्रांतियां और बड़े-बड़े परिवर्तन लाने वाले जन आंदोलन हुए हैं, उनमें कविता ने बहुत जान डाली है। हिंदी कविता से भारतीय सभ्यता को जितना ओज, साहस, बल, पराक्रम और रचनात्मक विभव मिला है, उतना विश्व की किसी अन्य सभ्यता को संभवतः न मिला हो। वेदव्यास की श्रीमद्भगवद्गीता से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस तक और मैथिलीशरण गुप्त की साकेत तथा जयशंकर प्रसाद की कामायनी से लेकर रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी तक कविता भारतीय संस्कृति को आलोकित करती रही है।
हम बड़े गर्व के साथ प्रायः कहते हैं कि विश्व की सभी सभ्यताएं लुप्त हो गईं, लेकिन हमारी सभ्यता को कोई नहीं मिटा सका। हमारी सभ्यता ने इतने बाहरी आक्रमण झेले, आततायियों ने हमारी संपदाओं को लूटा और ध्वस्त किया, तथा हमारी परंपराओं और मान्यताओं को अपवित्र करने का प्रयास किया, किंतु वे हमारी सभ्यता का बाल-बांका भी न कर पाए। भला क्यों? क्योंकि हमारी सभ्यता को यह संबल भारतीय भाषाओं से मिला। हिंदी और उसकी सहोदरा आंचलिक भाषाओं से उत्पन्न ऊर्जा हमारी सभ्यता को असीम शक्तियों से भरती है।
किसी राष्ट्र और सभ्यता के भाल पर उज्ज्वलता और ऐतिहासिक आत्मगौरव के भाव उसकी अपनी भाषा में लिखे होते हैं। भारत राष्ट्र और भारतीय सभ्यता की उज्ज्वलता और आत्मगौरव की भाषा हिंदी है। अगर ज्ञान की गहराइयों में जाकर अन्वेषण किया जाए तो कोई भाषा मर्मज्ञ कहेगा कि वह भाषा संस्कृत है, हिंदी नहीं। पर भारतीय सभ्यता के ज्ञान-प्रकाश से विश्व को प्रकाशित करने वाली संस्कृत ही हिंदी की जननी है। अगर समय की आंख से देखा जाए, तो भाषा और सभ्यता का विकास साथ-साथ चला है। मानव संचेतनाओं का विकास भी भाषा के विकास का समानुपाती रहा है। जिस राजनीति की इच्छा-शक्ति ही क्षीण रही हो, तो वह भाषा का क्या मोल जानती? इसलिए हिंदी राजभाषा रहते हुए भी मान की भाषा नहीं है किंतु, अपने बल पर वह अग्रणी हो रही है और सभी आंचलिक भाषाओं को ससम्मान जोड़े हुए है। आंचलिक भाषाओं से अनेक शब्दों, भावों और मुहावरों को आत्मसात कर हिंदी स्वयं को विकसित करती है। भाषा एक बहती नदी के समान है, जो अपनी स्वच्छता, निर्मलता और गतिज ऊर्जा बनाए रखती है। दुराग्रहों ने हिंदी को एक ठहरा तालाब-सा बना दिया है, जहां हमारी भाषा मलिन-से शब्दों से प्रदूषित होकर धीरे-धीरे अपनी गतिज ऊर्जा खोती जा रही है। हम अनावश्यक रूप से उत्सव में जश्न और फेस्टिवल मिला देना चाहते हैं।
हिंदी मात्र संप्रेषण तक ही सीमित नहीं है। यह भाषा है हमारे अस्तित्व की, हमारी अस्मिता की, हमारी चेतना की, हमारे हम होने की गौरवमयी अनुभूतियों की, हमारी संस्कृति और सभ्यता के अमृत-पोषण की, हमारी सृजनशीलता की, हमारे गौरवशाली इतिहास की। ऐसे में अपने आप से यह भी प्रश्न करना चाहिए कि भारत के गरिमापूर्ण उज्जवल भविष्य के लिए हिंदी के उत्तरोत्तर विकास की आवश्यकता है या नहीं?
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पहले मुगलों की और बाद में अंग्रेजों की परतंत्रता झेलते भारत में ऐसे लेखक और कवि अवतरित होते रहे, जिन्होंने हिंदी साहित्य के उत्कृष्टतम सृजन के साथ-साथ उसका प्रचार-प्रसार किया, तब जाकर एक राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा हो सकी। देश के विभाजन से पूर्व ही एक विमर्श लोकप्रिय कर दिया गया- तहजीब की भाषा। जब हम किसी एक भाषा को ‘तहजीब की भाषा’ कहेंगे, तब अन्य भाषा की महत्ता कैसे आंकेंगे? अब देख लीजिए, बॉलीवुड से लेकर दैनिकों तक की भाषा कैसी होती जा रही है। भारत से पृथक हुए देश ने जिसे कृत्रिम रूप से राष्ट्रभाषा बनाया, वहां पंजाबी, सिंधी, बलोच और मोहनजोदड़ो काल तक की अनेक भाषाओं का अस्तित्व कैसा हो गया?
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हिंदी के विकास का दायित्व हमारे यहां जिनके कंधों पर है, उन्हें पंत, निराला, महादेवी, प्रसाद, हरिऔध या दिनकर जैसों की हिंदी क्यों नहीं चाहिए? क्या सचमुच सरलता के नाम पर भाषा को प्रदूषित किया जाना चाहिए? मानव सभ्यताओं के उत्थान-पतन की कहानियां इतिहास के भाल पर उकेरी पड़ी हैं। इन सभ्यताओं के मूल में उनकी संस्कृतियां हैं और उनकी मौलिक भाषाओं में उनकी संस्कृतियों की सुगंध बसती है। संस्कृति किसी सभ्यता का पर्यावरण होती है और संस्कृति का पर्यावरण उसकी भाषा। जैसे जीव स्वस्थ पर्यावरण में पलते-बढ़ते हैं, उसी तरह संस्कृति भी एक संबलमय भाषा से पुष्पित-पल्लवित होती है, तथा अपनी भाषा से स्पंदित संस्कृति एक जीवंत, सुदृढ़, विकासवादी और चिरंजीवी सभ्यता को पोसती है।
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कोई भी सभ्यता, संस्कृति और भाषा संयुक्त रूप से एक एक भौगोलिक सीमाओं में पनपती हैं और इस भूगोल की मिट्टी, जल, वायु, और जलवायु की पृष्ठभूमि में अपना विकास करती हैं। सभ्यता-संस्कृति-भाषा एक धुरी है, जिसके सहारे मानवता हमारे ग्रह के विभिन्न भूगोलों में खिलती रही है। बाहरी आक्रमणों और आंतरिक कारकों से जब-जब यह धुरी टूटी है, तब-तब किसी सभ्यता का अंत हुआ है। किसी सभ्यता के टूटने और अंततः विलुप्त होने की प्रक्रिया उसकी भाषा के क्रमशः क्षरण से प्रारंभ होती है। भाषा सीधे या एक झटके में नहीं बिफरती। इसे पहले दोगला बनाया जाता है। दोगला बनकर इसके अर्थ बदलने लगते हैं और जिस संस्कृति को वह भाषा पोषित करती थी, शनैः शनैः उसकी भी सांसें उखड़ने लगती हैं और कालांतर में सभ्यता-संस्कृति-भाषा की सशक्त धुरी टूटकर सभ्यता को ही भूगोल से उखाड़कर फेंक देती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा से लेकर मिस्र, इराक, ईरान, एवं अफगानिस्तान तक और ऑस्ट्रेलिया से लेकर न्यूजीलैंड तक सभी देश वहां की मौलिक सभ्यताओं को रौंद कर अस्तित्व में आए हैं। अब वहां न मूल संस्कृति की कोई पहचान बची है, न उसकी भाषा। बाहरी लोग वहां नियंत्रण के लिए सैनिकों और व्यापारियों को लेकर गए थे। उनके साथ उनकी भाषा और विदेशी संस्कृति भी गईं। उनका नियंत्रण होने के बाद धीरे-धीरे राज करने वालों की भाषा के दबाव में स्थानीय भाषा संकर भाषा बनने लगी, स्थानीय संस्कृति पर ग्रहण लगने लगा और देखते ही देखते सहस्राब्दियों लंबी विकास यात्रा में पकी जीती-जागती भाषाई सभ्यताएं भी लुप्त हो गईं।
भाषा एक कला भी है और एक अद्भुत ऊर्जा भी। यह लिखित रूप में एक कला है। भाषा जब ध्वनि का रूप लेती है, जैसे बोलने-सुनने के रूप में, तो वह एक ऊर्जा है। वैज्ञानिक परिभाषा में ध्वनि एक ऊर्जा रूप है, प्रकाश की तरह। कलाओं का सौंदर्य और ऊर्जा का सकारात्मक प्रभाव मानव समाजों के लिए कितना आवश्यक है, यह हम जानते ही हैं। किसी भी भूगोल की मौलिक भाषा कलाओं के सौंदर्य और ऊर्जाओं की सकारात्मकता का योग है। ध्वनि एक ऐसी ऊर्जा है जिसका मानव मन पर गहरा प्रभाव अवश्यंभावी है। गीत सुनिए, कविता गायन सुनिए, भजन सुनिए, उन ध्वनि-ऊर्जाओं का अद्भुत प्रभाव मानव मन को तरंगित करता है। यह ऊर्जा हिंदी साहित्य की आत्मा है। देश में जितनी क्रांतियां और बड़े-बड़े परिवर्तन लाने वाले जन आंदोलन हुए हैं, उनमें कविता ने बहुत जान डाली है। हिंदी कविता से भारतीय सभ्यता को जितना ओज, साहस, बल, पराक्रम और रचनात्मक विभव मिला है, उतना विश्व की किसी अन्य सभ्यता को संभवतः न मिला हो। वेदव्यास की श्रीमद्भगवद्गीता से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस तक और मैथिलीशरण गुप्त की साकेत तथा जयशंकर प्रसाद की कामायनी से लेकर रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी तक कविता भारतीय संस्कृति को आलोकित करती रही है।
हम बड़े गर्व के साथ प्रायः कहते हैं कि विश्व की सभी सभ्यताएं लुप्त हो गईं, लेकिन हमारी सभ्यता को कोई नहीं मिटा सका। हमारी सभ्यता ने इतने बाहरी आक्रमण झेले, आततायियों ने हमारी संपदाओं को लूटा और ध्वस्त किया, तथा हमारी परंपराओं और मान्यताओं को अपवित्र करने का प्रयास किया, किंतु वे हमारी सभ्यता का बाल-बांका भी न कर पाए। भला क्यों? क्योंकि हमारी सभ्यता को यह संबल भारतीय भाषाओं से मिला। हिंदी और उसकी सहोदरा आंचलिक भाषाओं से उत्पन्न ऊर्जा हमारी सभ्यता को असीम शक्तियों से भरती है।
किसी राष्ट्र और सभ्यता के भाल पर उज्ज्वलता और ऐतिहासिक आत्मगौरव के भाव उसकी अपनी भाषा में लिखे होते हैं। भारत राष्ट्र और भारतीय सभ्यता की उज्ज्वलता और आत्मगौरव की भाषा हिंदी है। अगर ज्ञान की गहराइयों में जाकर अन्वेषण किया जाए तो कोई भाषा मर्मज्ञ कहेगा कि वह भाषा संस्कृत है, हिंदी नहीं। पर भारतीय सभ्यता के ज्ञान-प्रकाश से विश्व को प्रकाशित करने वाली संस्कृत ही हिंदी की जननी है। अगर समय की आंख से देखा जाए, तो भाषा और सभ्यता का विकास साथ-साथ चला है। मानव संचेतनाओं का विकास भी भाषा के विकास का समानुपाती रहा है। जिस राजनीति की इच्छा-शक्ति ही क्षीण रही हो, तो वह भाषा का क्या मोल जानती? इसलिए हिंदी राजभाषा रहते हुए भी मान की भाषा नहीं है किंतु, अपने बल पर वह अग्रणी हो रही है और सभी आंचलिक भाषाओं को ससम्मान जोड़े हुए है। आंचलिक भाषाओं से अनेक शब्दों, भावों और मुहावरों को आत्मसात कर हिंदी स्वयं को विकसित करती है। भाषा एक बहती नदी के समान है, जो अपनी स्वच्छता, निर्मलता और गतिज ऊर्जा बनाए रखती है। दुराग्रहों ने हिंदी को एक ठहरा तालाब-सा बना दिया है, जहां हमारी भाषा मलिन-से शब्दों से प्रदूषित होकर धीरे-धीरे अपनी गतिज ऊर्जा खोती जा रही है। हम अनावश्यक रूप से उत्सव में जश्न और फेस्टिवल मिला देना चाहते हैं।
हिंदी मात्र संप्रेषण तक ही सीमित नहीं है। यह भाषा है हमारे अस्तित्व की, हमारी अस्मिता की, हमारी चेतना की, हमारे हम होने की गौरवमयी अनुभूतियों की, हमारी संस्कृति और सभ्यता के अमृत-पोषण की, हमारी सृजनशीलता की, हमारे गौरवशाली इतिहास की। ऐसे में अपने आप से यह भी प्रश्न करना चाहिए कि भारत के गरिमापूर्ण उज्जवल भविष्य के लिए हिंदी के उत्तरोत्तर विकास की आवश्यकता है या नहीं?