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Khabaron Ke Khiladi: दिमागी नक्सल पर घमासान, विश्लेषकों ने बताया ये नया नैरेटिव या देश सुरक्षा का गंभीर मुद्दा

Sat, 22 Aug 2026 05:03 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 22 Aug 2026 05:03 PM IST
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Khabaron Ke Khiladi Dimagi Naxal Comment PM Modi Political Expert analysis Security question and more news
पीएम मोदी के दिमागी नक्सल वाले बयान पर सियासी घमासान। - फोटो : अमर उजाला
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल किया। इसके बाद से इस शब्द ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष इसे लेकर अपने-अपने दावे कर रहे हैं। दोनों ओर से इस शब्द के जरिए सियासी समीकरण साधे जा रहे हैं। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, राकेश शुक्ल, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।  
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पीयूष पंत: प्रधानमंत्री का 'दिमागी नक्सल' शब्द पुरानी बात को नए पैकेट में पेश करने जैसा है। जब भी सरकार की आलोचना होती है, उसे अति-वामपंथ के व्याकरण में रखकर निशाना बनाया जाता है। पहले इसे 'अर्बन नक्सल' कहते थे और अब 'दिमागी नक्सल' का रूप दे दिया गया है। जो लोग रिएक्ट करते हैं, जो क्रिटिकल एप्रेजल करते हैं, जो आपकी बातों को आलोचनात्मक रूप से एनलाइज करते हैं उसके खिलाफ दुनियाभर की दक्षिणपंथ की विचारधारा हमेशा से रही है। ये एक तरह से क्रिटिकल थॉट को टारगेट करने की कोशिश है। 
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राकेश शुक्ल: प्रधानमंत्री ने 'दिमागी नक्सल' शब्द का उपयोग अभिभावकों और बच्चों को संदेश देने के लिए लाल किले से किया। दिमागी नक्सल शब्द के बारे में जो मैं समझ पाया उसे ऐसे कह सकते हैं कि जैसे फसल के साथ खरपतवार उगकर उसे नष्ट कर देती है, वैसे ही देश की युवा पौध का ब्रेनवॉश करने वाले इस दिमागी नक्सलवादी खरपतवार से बच्चों को बचाना जरूरी है। जेपी, लोहिया और वाजपेयी जैसे विपक्षी नेताओं ने हमेशा मर्यादा में रहकर वैचारिक विरोध किया, लेकिन अब मर्यादा लांघकर बच्चों को हथियार बनाया जा रहा है। जब वैचारिक विरोध हिंसा और राष्ट्र-विरोध में बदल जाए तो देश नष्ट हो जाएगा।

पूर्णिमा त्रिपाठी: सरकार की नीतियों से असहमत होना देश का विरोध नहीं है, क्योंकि देश और सरकार समानार्थी नहीं हैं। सरकार का विरोध देश विरोध नहीं हो सकता है। यह कहना गलत है कि छात्र आंदोलनों में बच्चे केवल माता-पिता के सिखाने पर आ रहे हैं; डिजिटल युग में बच्चे अपनी बुद्धि से सोच रहे हैं। ऐसे में इन बच्चों को अभिभावकों से सीखने की जरूरत नहीं है। 'दिमागी नक्सल' कहना उस बुद्धिजीवी वर्ग को निशाना बनाना है जो नीतियों से वैचारिक असहमति रखता है। मुझे लगता है कि इस तरह की बात से गलत संदेश जाएगा।

अनुराग वर्मा: प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले जैसे सार्वजनिक मंच से बोली गई बात का व्यापक प्रभाव पड़ता है। जो लोग इसे सरकार द्वारा आलोचना दबाने का प्रयास कह रहे हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि आलोचना के डर से ही पूर्व में इमरजेंसी लगाई गई थी। सरकार की आलोचना करने में और देश की आलोचना के बीच बेहद महीन रेखा होती है। अगर आपकी आलोचना पाकिस्तान में हेडलाइन बने, तो वह सामान्य आलोचना नहीं है। 

विनोद अग्निहोत्री: इस शब्द का विरोध केवल कांग्रेस ने नहीं, बल्कि सिविल सोसाइटी और वामपंथी समूहों ने भी किया है। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम को नक्सल समर्थक नहीं कह सकते, क्योंकि उनके कार्यकाल में ही हथियारी नक्सलवाद के सफाये की शुरुआत हुई थी। 'अर्बन नक्सल' शब्द पुराना होने के कारण नैरेटिव बदलने के लिए 'दिमागी नक्सल' जैसा नया जुमला लाया गया है। सुप्रीम कोर्ट का भी फैसला है कि सोचने पर आप पाबंदी नहीं लगा सकते हैं। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान देता है, अन्यथा लोहिया और जेपी भी दिमागी नक्सल मान लिए जाएंगे।
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