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Srinagar News: डल के कचरे से पेपर माशी में कमाल, सिमरन ने खोजी हुनर की नई राह
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सूखे जलीय पौधों से कलाकृति बनातीं महिला कारीगर सिमरन। संवाद
- फोटो : Archive
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अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। डल झील से हर दिन निकलने वाली घास आमतौर पर सफाई के बाद कचरे में चली जाती है लेकिन श्रीनगर की सिमरन के लिए यही घास पेपर माशी की खूबसूरत कलाकृतियों का कच्चा माल बन गई है। नौशहरा जूनीमार निवासी सिमरन ने डल की सफाई से निकलने वाली खरपतवार का इस्तेमाल कर पारंपरिक कश्मीरी पेपर माशी को नया और पर्यावरण अनुकूल आधार देने का प्रयोग किया है।
पेपर माशी के पारंपरिक बेस तैयार करने में सिमरन पहले आमतौर पर रद्दी कागज, कॉपियों की लुगदी, आटा, गोंद का प्रयोग करती थीं। कच्चे माल और रद्दी कागज की कीमत बढ़ने से उत्पाद तैयार करने की लागत भी लगातार बढ़ रही थी। इसी समस्या ने सिमरन को कुछ नया सोचने के लिए प्रेरित किया। उनके सामने सवाल था कि ऐसा कौन सा कच्चा माल हो सकता है जो आसानी से उपलब्ध हो, लागत कम करे और पर्यावरण के लिए भी बेहतर हो। जवाब उन्हें डल झील की सफाई के दौरान दिखाई देने वाली घास में मिला।
उन्होंने डल से निकलने वाली घास को एकत्र करना शुरू किया। इसे पहले सुखाया, फिर बारीक कर रेशेदार पाउडर तैयार किया। इसके बाद रिसाइकल पेपर की लुगदी और बाइंडिंग एजेंट के साथ मिलाकर मिश्रण तैयार किया। यह मिश्रण इतना लचीला था कि उसे अलग-अलग सांचों में ढाला जा सकता था लेकिन इसे पेपर माशी के लिए मजबूत और टिकाऊ आधार में बदलना अभी बाकी था। यहीं से सिमरन की असली परीक्षा शुरू हुई।
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सही अनुपात और मजबूती हासिल करने के लिए उन्हें करीब दो साल तक लगातार प्रयोग करने पड़े। कई कोशिशें असफल हुईं। कहीं मिश्रण उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं था, तो कहीं आकार और बनावट में समस्या आई। मगर उन्होंने प्रयोग जारी रखा। आखिरकार दो साल की मेहनत के बाद घास के मिश्रण से उनकी पहली सफल कलाकृति तैयार हुई...एक फूलदान।
यह फूलदान हल्का था, लेकिन मजबूत। इसकी बनावट देखने में पत्थर जैसी थी और पारंपरिक पेपर माशी उत्पादों की तुलना में वजन भी कम था। सिमरन के लिए यह सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि दो साल के प्रयोग और असफलताओं के बाद मिली वह कामयाबी थी, जिसने उनके नए प्रयोग को आगे बढ़ाने का रास्ता खोल दिया।
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50 से 60 महिलाओं को दे चुकीं प्रशिक्षण
इस प्रयोग के साथ सिमरन ने अपने लिए ही नहीं, दूसरी महिलाओं के लिए भी नई राह तलाशनी शुरू कर दी। उन्होंने महिलाओं को इस हुनर से जोड़ना शुरू किया। अब तक करीब 50 से 60 महिलाओं को पेपर पल्प आधारित क्राफ्ट का मुफ्त प्रशिक्षण दे चुकीं सिमरन के साथ अभी 15 महिलाएं काम कर रही हैं। उनका लक्ष्य अधिक से अधिक युवतियों को इससे जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। सिमरन चाहती हैं कि सरकार उन्हें प्रदर्शनियों और बड़े बाजारों तक पहुंच का अवसर दे। उनका मानना है कि उचित मंच और प्रोत्साहन मिले तो घास से तैयार यह पर्यावरण अनुकूल पेपर माशी उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं।
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श्रीनगर। डल झील से हर दिन निकलने वाली घास आमतौर पर सफाई के बाद कचरे में चली जाती है लेकिन श्रीनगर की सिमरन के लिए यही घास पेपर माशी की खूबसूरत कलाकृतियों का कच्चा माल बन गई है। नौशहरा जूनीमार निवासी सिमरन ने डल की सफाई से निकलने वाली खरपतवार का इस्तेमाल कर पारंपरिक कश्मीरी पेपर माशी को नया और पर्यावरण अनुकूल आधार देने का प्रयोग किया है।
पेपर माशी के पारंपरिक बेस तैयार करने में सिमरन पहले आमतौर पर रद्दी कागज, कॉपियों की लुगदी, आटा, गोंद का प्रयोग करती थीं। कच्चे माल और रद्दी कागज की कीमत बढ़ने से उत्पाद तैयार करने की लागत भी लगातार बढ़ रही थी। इसी समस्या ने सिमरन को कुछ नया सोचने के लिए प्रेरित किया। उनके सामने सवाल था कि ऐसा कौन सा कच्चा माल हो सकता है जो आसानी से उपलब्ध हो, लागत कम करे और पर्यावरण के लिए भी बेहतर हो। जवाब उन्हें डल झील की सफाई के दौरान दिखाई देने वाली घास में मिला।
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उन्होंने डल से निकलने वाली घास को एकत्र करना शुरू किया। इसे पहले सुखाया, फिर बारीक कर रेशेदार पाउडर तैयार किया। इसके बाद रिसाइकल पेपर की लुगदी और बाइंडिंग एजेंट के साथ मिलाकर मिश्रण तैयार किया। यह मिश्रण इतना लचीला था कि उसे अलग-अलग सांचों में ढाला जा सकता था लेकिन इसे पेपर माशी के लिए मजबूत और टिकाऊ आधार में बदलना अभी बाकी था। यहीं से सिमरन की असली परीक्षा शुरू हुई।
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सही अनुपात और मजबूती हासिल करने के लिए उन्हें करीब दो साल तक लगातार प्रयोग करने पड़े। कई कोशिशें असफल हुईं। कहीं मिश्रण उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं था, तो कहीं आकार और बनावट में समस्या आई। मगर उन्होंने प्रयोग जारी रखा। आखिरकार दो साल की मेहनत के बाद घास के मिश्रण से उनकी पहली सफल कलाकृति तैयार हुई...एक फूलदान।
यह फूलदान हल्का था, लेकिन मजबूत। इसकी बनावट देखने में पत्थर जैसी थी और पारंपरिक पेपर माशी उत्पादों की तुलना में वजन भी कम था। सिमरन के लिए यह सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि दो साल के प्रयोग और असफलताओं के बाद मिली वह कामयाबी थी, जिसने उनके नए प्रयोग को आगे बढ़ाने का रास्ता खोल दिया।
50 से 60 महिलाओं को दे चुकीं प्रशिक्षण
इस प्रयोग के साथ सिमरन ने अपने लिए ही नहीं, दूसरी महिलाओं के लिए भी नई राह तलाशनी शुरू कर दी। उन्होंने महिलाओं को इस हुनर से जोड़ना शुरू किया। अब तक करीब 50 से 60 महिलाओं को पेपर पल्प आधारित क्राफ्ट का मुफ्त प्रशिक्षण दे चुकीं सिमरन के साथ अभी 15 महिलाएं काम कर रही हैं। उनका लक्ष्य अधिक से अधिक युवतियों को इससे जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। सिमरन चाहती हैं कि सरकार उन्हें प्रदर्शनियों और बड़े बाजारों तक पहुंच का अवसर दे। उनका मानना है कि उचित मंच और प्रोत्साहन मिले तो घास से तैयार यह पर्यावरण अनुकूल पेपर माशी उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं।

सूखे जलीय पौधों से कलाकृति बनातीं महिला कारीगर सिमरन। संवाद- फोटो : Archive

सूखे जलीय पौधों से कलाकृति बनातीं महिला कारीगर सिमरन। संवाद- फोटो : Archive