झारखंड: न सवाल समझ आया, न अपनी भाषा में मिला सफाई का मौका, हाईकोर्ट ने हत्या के आरोपी को किया बरी
झारखंड हाईकोर्ट ने धारा 313 के तहत आरोपी का बयान उसकी समझने वाली भाषा में दर्ज नहीं करने और प्रक्रियागत खामियों के आधार पर हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए निरक्षर चमरा उरांव को बरी कर दिया।
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झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी से उसकी समझ आने वाली भाषा में ही पूछताछ की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत आरोपी का बयान गलत तरीके से दर्ज करना और उसकी अपनी भाषा में स्पष्टीकरण न देना उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को प्रभावित करता है। उच्च न्यायालय की पीठ ने इसी आधार पर हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पा चुके निरक्षर व्यक्ति को बरी कर दिया है।
भाषा की बाधा और अनुवाद का अभाव
मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पाया कि अपीलकर्ता अनपढ़ ग्रामीण है। इसके बावजूद निचली अदालत ने आरोपी के बयान के सभी सवाल और जवाब केवल अंग्रेजी भाषा में दर्ज किए थे। अदालती रिकॉर्ड में इस बात का कोई संकेत नहीं मिला कि पूछे गए प्रश्नों को आरोपी की अपनी मातृभाषा में अनुवाद करके समझाया गया था या नहीं। खंडपीठ ने इस गंभीर चूक को रेखांकित करते हुए स्पष्ट टिप्पणी की कि जो व्यक्ति अंग्रेजी पढ़ना, लिखना या समझना नहीं जानता, उससे उसी भाषा में सवाल-जवाब नहीं किए जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि जब भी सुनवाई में भाषा की बाधा उत्पन्न होती है तो वहां अनुवादक की व्यवस्था की जानी चाहिए।
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बयान दर्ज करने में गंभीर प्रक्रियागत खामी
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले में एक अन्य गंभीर प्रक्रियागत खामी पर भी कड़ी नाराजगी जताई। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी की परीक्षा 22 जुलाई, 2016 को हुई थी, लेकिन बिजली कटौती का हवाला देते हुए उसके अंगूठे का निशान अगले दिन 23 जुलाई को लिया गया। वहीं कागजातों पर न्यायाधीश के हस्ताक्षर 22 जुलाई की ही तिथि में दर्ज थे।
कानूनी औपचारिकता को महज खानापूर्ति बना दिया
पीठ ने माना कि यह पूरी प्रक्रिया इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि बयान दर्ज करने की कानूनी औपचारिकता को महज खानापूर्ति बना दिया गया था। इससे आरोपी को गहरी क्षति उठानी पड़ी। खंडपीठ ने कहा कि धारा 313 का मुख्य उद्देश्य आरोपी को उसके खिलाफ पेश साक्ष्यों पर सफाई देने का उचित अवसर देना है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अहम हिस्सा है। इस तरह की गंभीर गड़बड़ी आरोपी को बरी करने का आधार बन सकती है।
निचली अदालत के फैसले को किया रद्द
यह पूरा मामला रांची की निचली अदालत के 25 अप्रैल, 2018 के फैसले से जुड़ा हुआ था। निचली अदालत ने चमरा उरांव को धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 20,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार 26 फरवरी 2009 को आपसी भूमि विवाद के कारण आरोपी ने प्रमेश्वरी देवी को जबरन कुएं में डुबोकर मार डाला था। उच्च न्यायालय ने सभी तथ्यों और गंभीर प्रक्रियागत खामियों को देखते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और चमरा उरांव को बरी करने का फैसला सुनाया।