सीखा स्वदेश प्यार में मैं लुट जाना
पर सीखा नहीं मैं कभी पीठ दिखाना
सीखा मैं स्वदेश सेवा में जुट जाना
सीखा नहीं मैं कभी शीष झुकाना
सीखा स्वदेश प्यार में मैं तपना तपाना
सीखा नहीं मैं कभी बहाना बनाना
मेरे खून का एक एक कतरा
स्वदेश के काम आए
उठा लूं मैं बड़ा से बड़ा खतरा
स्वदेश में न कभी शाम आए
रहे सदा सवेरा
सूरज डाले डेरा
सूरज कभी स्वदेश का डूबे नहीं
स्वदेश सेवा से मन मेरा कभी उबे नहीं
स्वदेश में बार बार मैं आऊं
स्वदेश को और सुंदर मैं बनाऊं।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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