अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली ...और पढ़ें
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हक़ीक़ी और मजाज़ी शायरी में फ़र्क़ ये पाया
कि वो जामे से बाहर है ये पाजामे से बाहर है
वस्ल हो या फ़िराक़ हो 'अकबर'
जागना रात भर मुसीबत है
इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम
वस्ल का दिल से...और पढ़ें
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बहन का प्यार जुदाई से कम नहीं होता
अगर वो दूर भी जाए तो ग़म नहीं होता
~ अज्ञात
किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा
~ मुनव्वर राना...और पढ़ें
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कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की...और पढ़ें
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