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चाँद कितना बेमिसाल लगता है

                
                                                         
                            अधूरा होकर भी चाँद कितना बेमिसाल लगता है,
                                                                 
                            
साथ में एक सितारा हो, तो मंज़र कमाल लगता है।

हर शख़्स मुकम्मल हो, ये ज़रूरी तो नहीं,
कुछ अधूरापन भी तो दिल को बेमिसाल लगता है।

तेरे साथ होने से ख़ामोशी भी बोल उठती है,
तेरे बिन हर ख़ुशी में कोई मलाल लगता है।

तू पास रहे तो रात भी छोटी-सी लगती है,
तू दूर हो तो दिन भी जाने क्यों साल लगता है।

तेरी एक नज़र मिल जाए अगर राह में,
फिर हर रास्ता मुझे अपना ख़याल लगता है।

हमने देखा है मोहब्बत को मुकम्मल होकर भी,
कभी अधूरा रिश्ता ही सबसे कमाल लगता है।

‘अशफ़ाक़’ चाँद को भी कहाँ ज़रूरत है पूर्ण होने की,
जिसके साथ कोई अपना हो, वही निहाल लगता है।
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5 घंटे पहले

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