गुनगुनाते ही रहे हैं, ऋतु वसंत बहार बन कर।
नज़रें इनायत हो सकीं ना, दिल दुखाया खार बन कर।।
प्रीति की ये रीति कैसी, कर नहीं सकते समर्पण?
टीसती हुईं उन रगों को, छू लिया अनजान बन कर।।
दीप जलता ही रहा, फिर भी तमस ये ना गया।
आलोक को परछाइयों ने, रोक ली दीवार बन कर।।
कहनें को था निर्मूल जो, फूल वह भी शूल था।
मग बिना कंटक था समझा, कंटकों के रोध बन कर।।
आंधियों को क्या दिखायें, बर्बादियों का ये हिसाब।
गर्दिशें चढ़ती गईं, मज़बूर पर मगरूर बन कर।।
ज़िन्दा रहे हैं हर तरफ, जिन्दादिली के नाम पर।
ज़िन्दगी तोहफ़ा बनीं ये, बाखुदा पहचान बन कर।।
हैं ख़ुदा तेरी रहम पर, साथ दो तन्हा न कर।
आब-ए-हयात अखनूर कर दो, फरियाद को सज्जाद बन कर।।
-कृष्ण मुरारी पाण्डेय
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