सारे सपने आँखों में खड़े थे, मगर हौसलों से बड़े थे,
रास्ते छोटे पड़ गए, क्योंकि इरादे कुछ ज्यादा ही बड़े थे।
घोड़े थे बेलगाम, लगाम हाथों में कहाँ थी,
हमारे तो, आसमान में धान बोने के इरादे थे।
मुट्ठी में रेत थी, फिर भी समंदर माँगते थे,
सूखी ज़मीन पर बादलों के सिकंदर माँगते थे,
लोग कहते थे… “ये ख़्वाब हक़ीक़त कैसे होंगे?”
हँसकर कहते थे… हम नामुमकिन से ही तो लड़ते थे।
हमने हवाओं से कहा… रास्ता बदलकर चलना,
बादलों से कहा… ज़रा नीचे उतरकर चलना,
धरती पर खेत बहुत देखे हैं हमने मगर,
इस बार तारों के बीच फसलें उगानी थी।
जो गिरा, उसे उठाया, जो टूटा उसे जोड़ा,
हर हार के गले में, जीत का सपना पिरोया,
लोग मंज़िल का पता पूछते रहे हमसे…
हम तो हर कदम को मंज़िल बनाते चले थे।
सारे सपने आँखों में खड़े थे, मगर हौसलों से बड़े थे,
घोड़े बेलगाम थे, और इरादे भी बड़े थे,
यहाँ लोग ज़मीन पर उम्मीदें बोते रहे,
हम तो आसमान में धान बोने निकले थे।
-रतन कुमार कैथवास
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