कितने आशियाने याद रखूँ मैं,
बड़ी घर बदले हैं मैंने।"
कुछ खण्डहरों की चाहत में कीमती आशियाने छूट गए
मेरे बिन वे घर भी अंदर ही अंदर टूट गए
बाहर से हँसते वे घर अंदर ही अंदर रोए होंगे
नीद चैन का पता नहीं न जाने कैसे वे सोए होंगे
खुद के स्वार्थपने में उनके सपने रह गए सुनैने
कितने आशियाने याद रखूँ मैं,
बड़ी घर बदले हैं मैंने।।
खण्डहरों में बड़ी हलचल हैं, आशियाने सिसक के सो गए
हम रंगरलियों में डूबे रहे, वे भी कहीं खो गए
समय कब रुक कर रहा है, वो चलता रहता है,
कहीं का किया हुआ, कहीं मिलकर रहता है।
इक रोज आधी के झोको में खण्डहर सारा टूट गया
मैं उनमें दबा-दबा अंदर ही अंदर घुट गया
आशियाने कुछ सज चुके हैं, कुछ सजने वाले हैं,
हम भी बेघर होकर हर रोज मरने वाले हैं,
अब मैं अकेला खड़ा हूँ अपने सपने लेकर सुनैने
किसके आशियाने जाऊँ मैं बड़ी घर बदले हैं मैंने।
बड़ी घर बदले हैं मैंने।।
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