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जो कुछ खोया, वह स्मृति बनकर अंतर्मन में रहेगा

                
                                                         
                            नील गगन के नीरव तट पर संध्या ने जब पंख पसारे,
                                                                 
                            
म्लान चाँदनी में डूब गए तब मेरे स्वप्नों के उजियारे।

मंद पवन की करुण लहरियाँ जब सूने उपवन से आईं,
झरते पर्णों की भाषा में जाने कितनी स्मृतियाँ गाईं।

दूर क्षितिज पर मेघ घिरे थे, नभ में गहन उदासी थी,
मन के सूने प्रांगण में भी एक अनाम निराशा थी।

शशि की शीतल किरणें उतरीं, पर मन का तम हर न पाईं,
जिनसे कभी मधुरता पाई, वे ही स्मृतियाँ पीड़ा लाई।

वीणा के तारों पर उँगली रखकर भी स्वर जाग न पाया,
हृदय कुंज में जाने किसने मौन का परदा डाल दिया।

किस अज्ञात विरह की छाया मन के आँगन में ठहरी,
किस विस्मृत अभिलाषा की स्मृति आँखों में बनकर लहरी।

अधरों पर जो शब्द ठहरे, वे भी बनकर मौन रह गए,
मन में जितने भाव उमड़े, सब नयनों में कौन कह गए।

पथ के दोनों ओर खड़े ये वृक्ष पुराने, स्थिर गंभीर,
जाने कितने युग से सुनते मेरे अंतर का संगीत अधीर।

नभ में तारक दीप जलाते, रात्रि न फिर भी दूर हुई,
जितनी बाहर ज्योति बिखरी, उतनी भीतर पीड़ा हुई।

कभी किसी निर्जन पथ पर जब पत्तों की सरसराहट होती,
लगता जैसे बीती ऋतुओं की कोई धुँधली आहट होती।

कभी नदी के शांत तट पर बैठा जब जल को निहारता,
अपनी ही छवि के टूटे प्रतिबिंबों में मन को पुकारता।

कितने प्रश्न अनुत्तरित रहकर अंतर में सो जाते हैं,
कितने भाव अभिव्यक्ति के अभाव में पत्थर हो जाते हैं।

कभी गगन में उड़ते पंछी लौट गहन वन में जाते,
उनके पीछे नयन न जाने किस अनजाने पथ को ताकते।

कभी पवन की एक लहर जब बंद किवाड़ हिलाती है,
बीती हुई किसी ऋतु की स्मृति चुपके से लौट आती है।

कभी पुष्प की मुरझाई पंखुड़ियों में रंग पुराने मिलते,
कभी शुष्क सरिता के तट पर जल के स्वप्न सुनहरे खिलते।

किससे कह दूँ कि मन के भीतर कितने सावन सूख गए हैं,
कितने मधुर गीत अधरों तक आकर फिर से रुक गए हैं।

फिर भी जीवन की गति रुकती नहीं, समय निरंतर बहता है,
सूखे वन के बीच कहीं कोई नवांकुर चुपचाप रहता है।

उषा की प्रथम किरण जब ओस कणों पर आकर ठहरी,
तब भी आँखों में थी नमी, पर दृष्टि कुछ अधिक थी गहरी।

समझा, विषाद केवल आँसू नहीं, अंतर्मन की वह भाषा है,
जिसमें मौन भी बोल उठता है और पीड़ा भी एक आशा है।

अब न उससे भागूँगा मैं, न उसे अपना सर्वस्व बनाऊँगा,
उसकी छाया में भी जीवन के सूक्ष्म स्वर पहचानूँगा।

जब फिर संध्या नील गगन पर अपने धुँधले रंग बिखेरेगी,
मेरी वीणा की मौन तान भी शायद कोई धुन सँवारेगी।

और यदि रात्रि फिर घिरेगी, मेघ घने हो जाएँगे,
तो भी मन के किसी कोने में कुछ दीपक जलते जाएँगे।

क्योंकि विषाद की गहराई में भी एक सत्य छिपा रहता है,
जो मन पीड़ा को समझ सके, वही जीवन को गा सकता है।

जो कुछ खोया, वह स्मृति बनकर अंतर्मन में रहेगा,
जो कुछ टूटा, उसका मौन भी जीवन का अर्थ कहेगा।

और जब कभी नीरव नभ में फिर चंद्रमा मुस्काएगा,
मेरा यह विषाद भी शायद कोई मधुर गीत बन जाएगा।
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20 घंटे पहले

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