अभी समय का ज्ञान नही है सभी मनुज के अंदर
इसीलिए तो मानव जीवन बिता रहा है दर दर
पृथ्वी पर मानव का प्रादुर्भाव हुआ है जबसे
समय कर रहा पीछा धरती पर मानव का तब से ।
कई सभ्यता छोड़ समय ने ऐसा मोड़ लिया है
मानव ने अपना नाता रुपये से जोड़ लिया है
रुपये का ही प्रेम समय ने डाल दिया है घर घर
इसीलिए तो मानव जीवन बिता रहा है दर दर
आज समय ने मानव को एक ऐसा पाठ पढ़ाया
सत्य नाम बदनाम हो गयी,झूठ को खूब बढ़ाया
मानव समझ रहा है खुद को, बहुत बड़ा बलशाली
कह कर ऐसा आज ,समय को दिया है उसने गाली
मनुज कर रहा नष्ट समय को,ऐसा सोच रहा है
किन्तु समय धीरे धीरे ,खुद उसे ख़रोच रहा है
एक दिन वही सभ्यता फिर से ,ढूंढेगा वह मर मर
इसीलिए तो मानव ,जीवन बिता रहा है दर दर
जिस धरती पर बिता रहा दर, मानव अपना जीवन
किया उसी को नँगा ,उसने काट लिए सारे वन
प्राणदायिनी वृक्ष को उसने ,एक न कहीं लगाया
जीवन का निर्माण तत्व ही ,उसने खूब गवाया ।
अगर समय से मानव ,अपनी भूल को नही सुधारा
शुद्ध वायु के लिए मनुज,विचारेगा मारा मारा
एक बुंद पानी पाने को तरसेंगे ,नारी- नर
इसीलिए तो मानव ,जीवन बिता रहा है दर दर ।
-अश्विनी सिंह। " अनुज "
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