मेरे सोवियत यूनियन के सफ़र की ख़ुशगवार यादों के निगारख़ाने में दो नौजवान आर्मेनी इंजीनियर भी हैं। उनके नाम मैंने पूछे थे लेकिन फिर याद नहीं रह गए। लेकिन वो दिल पर जो नक़्श छोड़ गए वो अब भी ताज़ा हैं। मेरे और उनके दरमियां हाफ़िज़ शिराज़ी का एक शेर है जिसने हमारी बाहमी मुहब्बत के रिश्ते को मज़बूत कर दिया है। अक्सर ऐसा होता है कि अच्छी शायरी टूटे हुए दिलों को जोड़ देती हैं, बिछड़े हुए को मिला देती है और अजनबियों को दोस्त बना देती है।
एक दिलचस्प वाक़िया मास्को के बाकू रेस्टोराँ में पेश आया। जब हम (नेरुदा और जैक) बाकू रेस्टोराँ में दाख़िल हुए तो कोई अज़रबैजानी का नग़्मा बज रहा था, लेकिन हमारी सूरत देखते ही साज़ पर "आवरा का गीत" बजने लगा। ये मुहब्बत और दोस्ती का एक ख़ूबसूरत इशारा था। रेस्टोराँ भरा हुआ था लेकिन सोवियतवालों ने अपने मेहमानों के लिए जगह ख़ाली कर दी और हम लोग एक मेज़ के गिर्द बैठ गए। गोर्की इंस्टिट्यूट के दो अदीब तालिब-इल्मों ने हमें देखा। एक नौउम्र लड़की थी और एक लड़का। दोनों ने आपस में कुछ सरगोशी की। लड़की का चेहरा तमतमा उठा और गालों में हँसी के भँवर गहरे हो गए। फिर दोनों हमारी मेज़ पर चले आए। आहिस्ता-आहिस्ता मुहब्बत का ये हलक़ा वसी होता गया। नान, कबाब, शोरबे में से एशिया की ख़ुशबू आ रही थी और चारों तरफ़ चेहरों पर सोवियत की मुहब्बत के फूल खिल रहे थे ।
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