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पतरोड़ू: पहाड़ की रसोई का ऐसा स्वाद, जिसकी खुशबू आज भी गांवों की याद दिलाती है; आपके यहां इसे क्या कहते हैं?
Tue, 08 Sep 2026 12:29 PM IST
Ankesh Dogra
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
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Published by: Ankesh Dogra
Updated Tue, 08 Sep 2026 12:29 PM IST
हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे पारंपरिक व्यंजन हैं, जिनका स्वाद सिर्फ जुबान ही नहीं बल्कि पहाड़ की संस्कृति और पुरानी यादों से भी जुड़ा है। इन्हीं में से एक है पतरोड़ू। अरबी के पत्तों से तैयार किया जाने वाला यह पकवान बरसात के मौसम में खास तौर पर बनाया जाता है। गांवों में आज भी महिलाएं पारंपरिक तरीके से इसे तैयार करती हैं। पढ़ें पूरी खबर...
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पतरोड़ू।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
पहाड़ों की खूबसूरती जितनी खास है, उतना ही अनोखा यहां का खान-पान भी है। हिमाचली रसोई में कई ऐसे पारंपरिक व्यंजन हैं, जिनका स्वाद पीढ़ियों से लोगों की जुबान पर कायम है। इन्हीं में से एक है पतरोड़ू। जिसे कुछ जिलों में बोली के आधार पर पतेड़ या अन्य नाम भी दिए गए हैं। अरबी के पत्तों से तैयार होने वाला यह पारंपरिक पकवान खासतौर पर बरसात के मौसम में पहाड़ी घरों की रसोई में अपनी खुशबू बिखेरता है।
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पतरोड़ू बनाने के लिए अरबी के बड़े और मुलायम पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पत्तों पर बेसन या स्थानीय मसालों से तैयार मिश्रण लगाया जाता है। इसके बाद पत्तों को एक के ऊपर एक रखकर रोल किया जाता है और भाप में पकाया जाता है। पकने के बाद इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर दोबारा तला या हल्का भुना जाता है। यही प्रक्रिया पतरोड़ू को उसका खास स्वाद और बनावट देती है।
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पहाड़ी क्षेत्रों में पतरोड़ू केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि परंपरा का हिस्सा माना जाता है। घर में जब इसे तैयार किया जाता है तो इसकी खुशबू से रसोई ही नहीं, बल्कि बचपन की यादें भी ताजा हो जाती हैं। बुजुर्ग महिलाएं आज भी इसे पुराने तरीके से बनाना पसंद करती हैं और नई पीढ़ी को इसकी विधि सिखाती हैं।
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बदलते दौर में जहां फास्ट फूड और बाजार में मिलने वाले नए व्यंजनों का चलन बढ़ा है, वहीं पतरोड़ू जैसे पारंपरिक पकवान हिमाचल की खान-पान की पहचान को जीवित रखे हुए हैं। कई जगहों पर स्थानीय मेले, उत्सव और पारंपरिक आयोजनों में भी ऐसे व्यंजनों को खास जगह दी जाती है।
पतरोड़ू की खासियत यह भी है कि इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री आमतौर पर स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है। यही वजह है कि यह व्यंजन पहाड़ी जीवनशैली और स्थानीय संसाधनों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
आज जब लोग पारंपरिक और स्थानीय खान-पान की ओर दोबारा लौट रहे हैं, ऐसे में पतरोड़ू जैसे हिमाचली व्यंजनों की पहचान को आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह सिर्फ स्वाद का मामला नहीं, बल्कि हिमाचल की लोक संस्कृति और पीढ़ियों पुरानी पाक परंपरा को बचाए रखने का सवाल भी है।
आज जब लोग पारंपरिक और स्थानीय खान-पान की ओर दोबारा लौट रहे हैं, ऐसे में पतरोड़ू जैसे हिमाचली व्यंजनों की पहचान को आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह सिर्फ स्वाद का मामला नहीं, बल्कि हिमाचल की लोक संस्कृति और पीढ़ियों पुरानी पाक परंपरा को बचाए रखने का सवाल भी है।