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मर गई रिश्तों की अहमियत: बुजुर्ग दंपती को वृंदावन में छोड़ गए रिश्तेदार, सड़क पर भूखे-प्यासे तड़पते रहे

Wed, 30 Sep 2026 10:47 PM IST
Akash Dubey अमर उजाला नेटवर्क, वृंदावन (मथुरा)
अमर उजाला नेटवर्क, वृंदावन (मथुरा) Published by: Akash Dubey Updated Wed, 30 Sep 2026 10:47 PM IST
सार
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भटिंडा के संतानहीन बुजुर्ग राजेंद्र और संतोष को रिश्तेदारों ने वृंदावन में बेसहारा छोड़ दिया। अपना घर आश्रम ने उन्हें नया जीवन दिया है। बुजुर्ग संतोष के भाई आईटी अफसर हैं।

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Relatives abandoned elderly couple in Vrindavan
सड़क किनारे बैठे बुजुर्ग दंपती - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संतान न होने की सजा या रिश्तों की घटती संवेदनहीनता? पंजाब के भटिंडा से आए एक बुजुर्ग दंपती की मार्मिक दास्तां ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। जिन रिश्तों पर बुढ़ापे की लाठी बनने की उम्मीद थी, वही रिश्तेदार धोखा देकर उन्हें वृंदावन की सड़कों पर बेसहारा छोड़ गए। कई दिनों तक अटल्ला चुंगी पर दयनीय स्थिति में बेबस पड़े रहे बुजुर्ग दंपती के लिए आखिरकार अपना घर आश्रम फरिश्ता बनकर सामने आया और दोनों को नया जीवन दिया।

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पंजाब, भटिंडा निवासी 74 वर्षीय राजेंद्र और उनकी पत्नी 72 वर्षीय संतोष के पास कोई संतान नहीं है। यही उनकी सबसे बड़ी बेबसी बन गई। आरोप है कि उनके अपने ही रिश्तेदार बुढ़ापे में मदद का झांसा देकर उन्हें घर से लेकर आए और वृंदावन के अटल्ला चुंगी के पास लावारिस हालत में छोड़कर चले गए। अपना आश्रम के प्रबंधक धन्नाराम जांदू ने बताया कि वह पिछले 15 दिनों से नगर की सड़कों पर भटक रहे थे।

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पहले वह गोरे दाऊजी मंदिर के समीप फुटपाथ पर रहे। उसके बाद वह अटल्ला चुंगी चौराहा पर बस स्टेंड पर समय गुजार रहे थे। वहां से निकल रही अपना घर आश्रम की टीम की नजर बुजुर्ग दंपति पर पड़ी तो वह उन्हें अपने आश्रम ले आए। टीम ने दंपति के बताए भटिंडा की श्याम गली में उनके मकान और परिजनों की तलाश की। लेकिन सामने आया कि उनका घर भी बिक चुका है। इनके कोई संतान नहीं है।

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भाई आईटी अफसर, फिर भी बहन सड़क पर लाचार
रिश्तों के खोखलेपन की हद तो तब पार हो गई जब पता चला कि महिला संतोष के भाई एक प्रतिष्ठित आईटी अफसर हैं। बावजूद इसके, बुढ़ापे की इस दहलीज पर बहन को अपनों का साया तक नसीब नहीं हुआ। कई दिनों तक यह बुजुर्ग दंपती भूख-प्यास और शारीरिक लाचारी के बीच सड़क किनारे तड़पता रहा, लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं आया। बुजुर्ग राजेंद्र ने कहा कि जब अपनों ने ही पूरी तरह मुंह मोड़ लिया और सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया, तब आश्रम ने हमें नया जीवन दिया। अगर आश्रम की टीम न आती तो शायद हम जिंदा न बचते।

अपना घर आश्रम बना फरिश्ता, बचाई दो जिंदगियां
जब स्थानीय लोगों और आश्रम की टीम की नजर अटल्ला चुंगी पर अत्यंत जर्जर हालत में पड़े इस दंपति पर पड़ी, तो उन्होंने तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया। अपना घर आश्रम की टीम ने दोनों को सुरक्षित आश्रम पहुंचाया, जहां उन्हें भोजन, कपड़ा, चिकित्सकीय देखभाल और अपनों जैसा सम्मानजनक माहौल दिया गया। आश्रम के प्रबंधक ने बताया कि बुजुर्ग दंपति को रोटी, कपड़ा और छत दी है। उनकी काउंसलिंग की जा रही है। जिससे के उनको अपनों तक पहुंचाया जा सके। उनके रिश्तेदारों की तलाश की जा रही है।

समाज के लिए बड़ा सवाल
वृंदावन की पावन भूमि पर घटी यह घटना समाज की गिरती मानसिकता और बुजुर्गों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। क्या संतान न होना ही बुढ़ापे की सबसे बड़ी सजा है? फिलहाल, अपना घर आश्रम ने दोनों बुजुर्गों को आश्रय देकर एक बार फिर साबित कर दिया है कि भले ही खून के रिश्ते बेवफा हो जाएं, लेकिन इंसानियत आज भी जिंदा है।

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