खास खबर: खिसक रही नैनीताल की जमीन, 60% डेंजर जोन में, डिजिटल मैपिंग से मिले गंभीर संकेत; ये है कारण
नैनीताल भू-स्खलन और भू-धंसाव के बढ़ते खतरे से जूझ रही है। डीएसटी और कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की संयुक्त डिजिटल मैपिंग और जीआईएस अध्ययन में शहर के भू-भाग को लेकर गंभीर संकेत मिले हैं।
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सरोवर नगरी भू-स्खलन और भू-धंसाव के बढ़ते खतरे से जूझ रही है। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) और कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की संयुक्त डिजिटल मैपिंग और जीआईएस अध्ययन में शहर के भू-भाग को लेकर गंभीर संकेत मिले हैं। अध्ययन के अनुसार नैनीताल का 60 फीसदी से अधिक हिस्सा डेंजर जोन की जद में है। संवेदनशील ढलानों पर बढ़ता निर्माण, भारी वाहनों का दबाव और पानी के प्राकृतिक रास्तों में बदलाव पहाड़ों की स्थिरता के लिए खतरा बढ़ा रहे हैं।
शहर के कई हिस्सों में जमीन के धीरे-धीरे खिसकने के संकेत सामने आ रहे हैं। बिड़ला सड़क, टिफिन टॉप, आयारपाटा स्थित एनसीसी कार्यालय के आसपास और भोटिया मार्केट के नीचे मुख्य पहाड़ी पर करीब 100 मीटर ऊपर से एक बड़ा पैच नीचे की ओर खिसक रहा है। यहां पेड़ों और बिजली के खंभों का असामान्य तरीके से झुकना जमीन में हो रही हलचल का संकेत माना जा रहा है। भूगर्भीय प्रक्रिया में इस तरह के धीमे खिसकाव को सॉइल क्रीप कहा जाता है। संवाद
सात नंबर में घरों में दरार, बलियानाला भी संवेदनशील
सात नंबर क्षेत्र में कई घरों में गहरी दरारें सामने आई हैं। वहीं सत्यनारायण मंदिर के पास करीब 200 मीटर का पैच और बलियानाला क्षेत्र भी ढीली मिट्टी व भू-गर्भीय अस्थिरता के कारण संवेदनशील बना हुआ है। विशेषज्ञों के मुताबिक बारिश के दौरान इन क्षेत्रों में खतरा और बढ़ सकता है।
भारी वाहनों का कंपन बढ़ा रहा खतरा
नैनीताल की संवेदनशील पहाड़ी ढलानों पर भारी वाहनों की आवाजाही भी चिंता का विषय है। वाहनों से उत्पन्न कंपन चट्टानों और ढीले भू-भाग की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। बारिश के दौरान पानी इन कमजोर हिस्सों में प्रवेश कर ढलान को और अस्थिर कर देता है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के डॉ. पीसी चन्याल के अनुसार ब्रिटिश काल में शेर का डांडा पहाड़ी पर भूस्खलन के बाद जमीन के खिसकने की निगरानी के लिए छह फुट ऊंचे पिलर लगाए गए थे। उनका कहना है कि आज संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत है।
कंक्रीट ने रोके पानी के प्राकृतिक रास्ते
विशेषज्ञों के मुताबिक नैनीताल बेसिन में लगातार बढ़ते निर्माण के कारण पानी के कई प्राकृतिक रास्ते प्रभावित हुए हैं। ढलानों पर कंक्रीट का विस्तार होने से बारिश के पानी के प्राकृतिक निकास में बदलाव आया है। इससे जमीन के भीतर पानी का दबाव बढ़ने और ढलानों की स्थिरता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
नैनीताल में धारण क्षमता के आधार पर मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना जरूरी है। संवेदनशील क्षेत्रों के लिए स्थानीय स्तर पर मॉनिटरिंग टीम गठित की जानी चाहिए। टीम को हर महीने खतरनाक बिंदुओं की समीक्षा कर सक्रिय पैच की वैज्ञानिक निगरानी करनी चाहिए। समय रहते निगरानी और सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का खतरा बढ़ सकता है। डॉ. पीसी चन्याल, रिमोट सेंसिंग-जीआईएस विशेषज्ञ, भूगोलवेत्ता