फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jharkhand ›   jharkhand-high-court-section-498a-illegal-demand-not-necessarily-dowry-cruelty-case

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 498A में हर गैरकानूनी मांग ‘दहेज’ हो यह जरूरी नहीं, पति-ससुराल पक्ष को झटका

Wed, 26 Aug 2026 09:35 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी Updated Wed, 26 Aug 2026 09:35 PM IST
सार
Register For Event

झारखंड हाईकोर्ट ने महिला उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि धारा 498A के तहत अपराध साबित करने के लिए किसी गैरकानूनी मांग को ‘दहेज’ कहना जरूरी नहीं है। अदालत ने पति और ससुराल पक्ष के तीन आरोपितों को बरी करने का आदेश रद्द कर निचली अदालत का दोषसिद्धि फैसला बहाल कर दिया।

विज्ञापन
jharkhand-high-court-section-498a-illegal-demand-not-necessarily-dowry-cruelty-case
झारखंड उच्च न्यायालय - फोटो : ANI

विस्तार

झारखंड उच्च न्यायालय ने महिला उत्पीड़न से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत अपराध साबित करने के लिए महिला से मांगी गई राशि को 'दहेज' नाम देना अनिवार्य नहीं है। किसी भी प्रकार की संपत्ति या पैसे की गैरकानूनी मांग को पूरा कराने के मकसद से यदि महिला को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो वह पूरी तरह क्रूरता के दायरे में आता है।
विज्ञापन


न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय पूर्वी सिंहभूम निवासी अनीता भकत की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। उच्च न्यायालय ने मामले में अपीलीय अदालत द्वारा पति और ससुराल पक्ष के तीन आरोपितों को बरी करने के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है। इसके साथ ही निचली अदालत के दोषसिद्धि के फैसले को बहाल करते हुए सभी आरोपितों को दो महीने के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश जारी किया है।
विज्ञापन


गैरकानूनी मांग और धारा 498 ए का दायरा
उच्च न्यायालय ने विस्तृत फैसले में अपीलीय अदालत के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कारोबार बढ़ाने के उद्देश्य से मांगी गई राशि को दहेज की मांग नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि धारा 498 ए का दायरा केवल पारंपरिक दहेज की मांग तक सीमित नहीं है। इसमें किसी भी अवैध संपत्ति या मूल्यवान वस्तु की मांग को पूरा कराने के लिए महिला पर अनुचित दबाव डालना, उसे प्रताड़ित करना और उसके जीवन को संकट में डालना शामिल है।
विज्ञापन
विज्ञापन


न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने माना, वर्तमान मामले में पति द्वारा मांगी गई 1 लाख रुपये की राशि पूरी तरह से गैरकानूनी थी। मांग की पूर्ति के लिए महिला को लगातार मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जो कानूनी रूप से क्रूरता का अपराध है।

 विवाह के बाद प्रताड़ना और पुलिस में शिकायत
मामले के अनुसार, पूर्वी सिंहभूम की अनीता भकत का विवाह 25 जून, 2008 को गौरांग भकत के साथ संपन्न हुआ था। विवाह के समय महिला के मायके पक्ष ने 1 लाख रुपये नकद, सोने के आभूषण और लगभग तीन लाख रुपये मूल्य का घरेलू सामान दिया था। शादी के कुछ ही समय बाद पति ने चावल के अपने व्यापार का विस्तार करने के लिए हालर मशीन खरीदने के नाम पर मायके से अतिरिक्त 1 लाख रुपये लाने की मांग शुरू कर दी।

जब यह मांग पूरी नहीं हुई, तो महिला के साथ मारपीट की गई और गंभीर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी गई। गर्भावस्था के दौरान भी महिला को पीटा गया और आवश्यक चिकित्सीय इलाज की सुविधा से वंचित रखा गया। इसके बाद एक मार्च, 2009 को दोबारा एक लाख रुपये लाने का दबाव बनाया गया। मांग पूरी न होने पर जान से मारने की धमकी देकर मारपीट की गई और महिला को घर से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद पीड़िता ने पुलिस थाने में शिकायत दी और बाद में अदालत में शिकायतवाद दर्ज कराया।

 निचली अदालत का फैसला और आत्मसमर्पण का आदेश
मामले की शुरुआती सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने पति तथा ससुराल पक्ष के लोगों को भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए और धारा 323 के तहत दोषी ठहराया था। हालांकि, अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए आरोपितों को बरी कर दिया था कि एक लाख रुपये की मांग व्यापारिक विस्तार के लिए थी, इसलिए इसे दहेज नहीं माना जा सकता।


ये भी पढ़ें- Liveबिहार में बाढ़ का खतरा Live: नेपाल से प्रलय रात में ही पहुंच रहा बिहार; किस समय तक आएगा, बचाव की तैयारी देखें

उच्च न्यायालय ने अपीलीय अदालत की इस धारणा को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को वापस बहाल कर दिया। उच्च न्यायालय ने पति समेत तीनों आरोपितों को निर्देश दिया है कि वे दो महीने की तय सीमा के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर अपनी सजा भुगतें। अदालत ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि आरोपित निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट उनके खिलाफ तत्काल गिरफ्तारी और जेल भेजने के लिए कानूनी कार्रवाई करे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed