ज़िंदगी के ये सवालात कहाँ थे पहले
इतने उलझे हुए हालात कहाँ थे पहले
अब तो इज़्हार-ए-तमन्ना से भी जी डरता है
इतने सहमे हुए जज़्बात कहाँ थे पहले
हुस्न और 'इश्क़ हुए कितने मुक़द्दस हम से
इतने पाकीज़ा ख़यालात कहाँ थे पहले
आज हर गाम पे जलते हैं चराग़-ए-मंज़िल
रह-गुज़र में ये मक़ामात कहाँ थे पहले
हम को बदले हुए हालात ने बख़्शा ये शरफ़
आप पाबंद-ए-मुलाक़ात कहाँ थे पहले
हम ने मयख़ाने में साक़ी का भरम खोल दिया
हम से रिंदान-ए-ख़राबात कहाँ थे पहले
मेरी नज़रों के ये अंदाज़-ए-नज़र हैं 'मुज़्तर'
हर नज़र में ये पयामात कहाँ थे पहले
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