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MP News: 10 साल में मलेरिया 98% काबू, फिर भी नहीं थमा संक्रमण; इस वर्ष अब तक 583 केस, बालाघाट हॉटस्पॉट
Fri, 21 Aug 2026 06:57 PM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Fri, 21 Aug 2026 06:57 PM IST
मध्य प्रदेश में मलेरिया के मामले लगातार घट रहे हैं, लेकिन कुछ जिलों में बीमारी का खतरा अब भी बना हुआ है। 2026 में जुलाई तक 583 केस मिले हैं, इनमें अकेले बालाघाट में 174 मामले सामने आए हैं।
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मलेरिया का खतरा
- फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
प्रदेश में इस साल सात माह में 583 मलेरिया के केस सामने आए हैं। इसमें सबसे ज्यादा केस बालाघाट में सामने आए हैं। 2026 के जुलाई तक के जिला-वार आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 583 मलेरिया पॉजिटिव केस दर्ज हो चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा 174 मामले बालाघाट में हैं। इसके बाद छिंदवाड़ा में 67, श्योपुर और डिंडौरी में 38-38, झाबुआ में 31, सतना में 27 और नीमच में 20 मामले सामने आए हैं। यानी सात महीने में सामने आए कुल मामलों में अकेले बालाघाट की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है। इससे साफ है कि प्रदेश में मलेरिया का खतरा अब पूरे राज्य में समान नहीं है, बल्कि कुछ खास जिलों और क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है। स्वास्थ्य विभाग के डिप्टी डायरेक्टर हिमांशु जसवार ने कहा कि मलेरिया नियंत्रण के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में सफलता मिली है। मामलों में आई बड़ी कमी इस बात का संकेत है कि सर्विलांस, समय पर जांच और उपचार तथा मच्छर नियंत्रण की गतिविधियों का असर जमीन पर दिखाई दे रहा है। जहां मामले आ रहे है, उनको नियंत्रित करने की भी कार्रवाई की जा रही हैं।
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बालाघाट में 83 नमूनों में 21 में खसरे से पीड़ित मिले
बालाघाट में बच्चों की मौत के बाद आईसीएमआर की जांच में प्रभावित इलाकों से बच्चों के 83 नमूनों में से 21 में मिजल्स (खसरा) के संकेत मिले हैं। वहीं, 16 बच्चों की जांच में 8 मलेरिया पॉजिटिव पाए गए। जानकारी के अनुसार क्षेत्र में पिछले दो-तीन वर्षों से टीकाकरण का कवरेज 50 से 60 प्रतिशत के आसपास रहा। इसके चलते बड़ी संख्या में बच्चों को खसरे का टीका नहीं मिल सका। स्वास्थ्य विभाग ने अब प्रभावित क्षेत्र में विशेष टीकाकरण अभियान शुरू किया है। अधिकारियों के अनुसार बच्चों में कुपोषण और पोषण की कमी के कारण रोगों से लड़ने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे में विभिन्न संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
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जुलाई में ही 248 मामले
आंकड़ों में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है। सिर्फ जुलाई महीने में प्रदेश में 248 मलेरिया पॉजिटिव केस मिले। इनमें बालाघाट में 102, छिंदवाड़ा में 24 और श्योपुर में 19 मामले शामिल हैं। यानी जुलाई में सामने आए मामलों में भी बालाघाट की हिस्सेदारी करीब 41 फीसदी रही। यह संकेत देता है कि मानसून के दौरान मलेरिया का जोखिम कुछ जिलों में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले महीनों में इन हॉटस्पॉट जिलों पर निगरानी और बढ़ाने की जरूरत है।
2025 में भी बालाघाट था सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
2025 के पूरे साल के आंकड़ों में भी बालाघाट सबसे आगे रहा था। जिले में 685 मामले दर्ज किए गए थे, जो प्रदेश के कुल 2,126 मामलों का करीब एक-तिहाई थे। इसके बाद झाबुआ में 141, छिंदवाड़ा में 135, नीमच में 120, सतना में 95 और नरसिंहपुर में 89 मामले सामने आए थे। अब 2026 के शुरुआती सात महीनों के आंकड़ों में भी बालाघाट सबसे ऊपर है। इसका मतलब है कि जिले में मलेरिया का खतरा एक साल से लगातार बना हुआ है।
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जंगल और आदिवासी क्षेत्रों पर ज्यादा नजर की जरूरत
मलेरिया के ज्यादा मामले प्रदेश के पूर्वी और दक्षिणी वन क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं। बालाघाट, मंडला, डिंडोरी, छिंदवाड़ा और आसपास के इलाकों में जंगल, दूर-दराज की बसाहट और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच जैसी चुनौतियां बीमारी पर नियंत्रण को मुश्किल बनाती हैं। खासकर ऐसे इलाकों में समय पर टेस्टिंग, दवा की उपलब्धता, मच्छर नियंत्रण और मरीजों की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
2025 के मुकाबले 2026 में तस्वीर क्या कहती है?
2026 में जुलाई तक सामने आए 583 मामले, 2025 में पूरे साल दर्ज हुए 2,126 मामलों के करीब 27 फीसदी हैं। लेकिन दोनों आंकड़ों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि एक पूरे साल का है और दूसरा सिर्फ सात महीने का। फिर भी जिला स्तर पर एक बात साफ दिखाई देती है मलेरिया का प्रकोप कुछ खास इलाकों में लगातार बना हुआ है। 2025 में जहां बालाघाट, झाबुआ, छिंदवाड़ा, नीमच और सतना जैसे जिले ज्यादा प्रभावित थे, वहीं 2026 के जुलाई तक बालाघाट और छिंदवाड़ा के साथ श्योपुर और डिंडोरी भी प्रमुख जिलों के रूप में सामने आए हैं।
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2015 के एक लाख से 2025 में सिर्फ 2,126
मलेरिया नियंत्रण की लंबी तस्वीर देखें तो गिरावट काफी बड़ी है। 2015 में 1,00,597 मामले थे। 2016 में 69,106, 2017 में 47,541 और 2018 में 22,279 मामले दर्ज हुए। इसके बाद 2019 में 14,147, 2020 में 6,760, 2021 में 3,181, 2022 में 3,826, 2023 में 3,794, 2024 में 3,247 और 2025 में 2,126 मामले दर्ज हुए। यानी 10 साल में मलेरिया के मामलों में करीब 98 फीसदी की गिरावट आई है।
खतरनाक फाल्सीपेरम में भी बड़ी गिरावट
मलेरिया के फाल्सीपेरम संक्रमण को गंभीर माना जाता है। 2015 में इसके 39,125 मामले दर्ज हुए थे, जो 2025 में घटकर 1,146 रह गए। वहीं, विवैक्स के मामले 61,472 से घटकर 937 रह गए। फाल्सीपेरम के मामलों में भी 97 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है। हालांकि, 2025 में एक हजार से ज्यादा मामले सामने आना बताता है कि बीमारी का गंभीर स्वरूप अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
2026 में 9 जिलों में अब तक कोई केस नहीं
जुलाई तक के जिला-वार आंकड़ों में 583 मामले दर्ज हुए हैं। वहीं जानकारी के अनुसार नौ जिलों में अभी तक कोई पॉजिटिव मलेरिया केस दर्ज नहीं हुआ है। इनमें बुरहानपुर, देवास, नर्मदापुरम, हरदा, राजगढ़, विदिशा, उमरिया, निवाड़ी और पांढुर्णा शामिल हैं। इससे यह भी सामने आता है कि प्रदेश में मलेरिया का संक्रमण अब सीमित क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है।
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बालाघाट में 83 नमूनों में 21 में खसरे से पीड़ित मिले
बालाघाट में बच्चों की मौत के बाद आईसीएमआर की जांच में प्रभावित इलाकों से बच्चों के 83 नमूनों में से 21 में मिजल्स (खसरा) के संकेत मिले हैं। वहीं, 16 बच्चों की जांच में 8 मलेरिया पॉजिटिव पाए गए। जानकारी के अनुसार क्षेत्र में पिछले दो-तीन वर्षों से टीकाकरण का कवरेज 50 से 60 प्रतिशत के आसपास रहा। इसके चलते बड़ी संख्या में बच्चों को खसरे का टीका नहीं मिल सका। स्वास्थ्य विभाग ने अब प्रभावित क्षेत्र में विशेष टीकाकरण अभियान शुरू किया है। अधिकारियों के अनुसार बच्चों में कुपोषण और पोषण की कमी के कारण रोगों से लड़ने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे में विभिन्न संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
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जुलाई में ही 248 मामले
आंकड़ों में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है। सिर्फ जुलाई महीने में प्रदेश में 248 मलेरिया पॉजिटिव केस मिले। इनमें बालाघाट में 102, छिंदवाड़ा में 24 और श्योपुर में 19 मामले शामिल हैं। यानी जुलाई में सामने आए मामलों में भी बालाघाट की हिस्सेदारी करीब 41 फीसदी रही। यह संकेत देता है कि मानसून के दौरान मलेरिया का जोखिम कुछ जिलों में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले महीनों में इन हॉटस्पॉट जिलों पर निगरानी और बढ़ाने की जरूरत है।
2025 में भी बालाघाट था सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
2025 के पूरे साल के आंकड़ों में भी बालाघाट सबसे आगे रहा था। जिले में 685 मामले दर्ज किए गए थे, जो प्रदेश के कुल 2,126 मामलों का करीब एक-तिहाई थे। इसके बाद झाबुआ में 141, छिंदवाड़ा में 135, नीमच में 120, सतना में 95 और नरसिंहपुर में 89 मामले सामने आए थे। अब 2026 के शुरुआती सात महीनों के आंकड़ों में भी बालाघाट सबसे ऊपर है। इसका मतलब है कि जिले में मलेरिया का खतरा एक साल से लगातार बना हुआ है।
ये भी पढ़ें- MP News: मध्यप्रदेश में 32 IAS अफसरों के तबादले, बदले कई जिलों के सीईओ; अभिषेक चौधरी ग्वालियर ननि आयुक्त बने
जंगल और आदिवासी क्षेत्रों पर ज्यादा नजर की जरूरत
मलेरिया के ज्यादा मामले प्रदेश के पूर्वी और दक्षिणी वन क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं। बालाघाट, मंडला, डिंडोरी, छिंदवाड़ा और आसपास के इलाकों में जंगल, दूर-दराज की बसाहट और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच जैसी चुनौतियां बीमारी पर नियंत्रण को मुश्किल बनाती हैं। खासकर ऐसे इलाकों में समय पर टेस्टिंग, दवा की उपलब्धता, मच्छर नियंत्रण और मरीजों की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
2025 के मुकाबले 2026 में तस्वीर क्या कहती है?
2026 में जुलाई तक सामने आए 583 मामले, 2025 में पूरे साल दर्ज हुए 2,126 मामलों के करीब 27 फीसदी हैं। लेकिन दोनों आंकड़ों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि एक पूरे साल का है और दूसरा सिर्फ सात महीने का। फिर भी जिला स्तर पर एक बात साफ दिखाई देती है मलेरिया का प्रकोप कुछ खास इलाकों में लगातार बना हुआ है। 2025 में जहां बालाघाट, झाबुआ, छिंदवाड़ा, नीमच और सतना जैसे जिले ज्यादा प्रभावित थे, वहीं 2026 के जुलाई तक बालाघाट और छिंदवाड़ा के साथ श्योपुर और डिंडोरी भी प्रमुख जिलों के रूप में सामने आए हैं।
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2015 के एक लाख से 2025 में सिर्फ 2,126
मलेरिया नियंत्रण की लंबी तस्वीर देखें तो गिरावट काफी बड़ी है। 2015 में 1,00,597 मामले थे। 2016 में 69,106, 2017 में 47,541 और 2018 में 22,279 मामले दर्ज हुए। इसके बाद 2019 में 14,147, 2020 में 6,760, 2021 में 3,181, 2022 में 3,826, 2023 में 3,794, 2024 में 3,247 और 2025 में 2,126 मामले दर्ज हुए। यानी 10 साल में मलेरिया के मामलों में करीब 98 फीसदी की गिरावट आई है।
खतरनाक फाल्सीपेरम में भी बड़ी गिरावट
मलेरिया के फाल्सीपेरम संक्रमण को गंभीर माना जाता है। 2015 में इसके 39,125 मामले दर्ज हुए थे, जो 2025 में घटकर 1,146 रह गए। वहीं, विवैक्स के मामले 61,472 से घटकर 937 रह गए। फाल्सीपेरम के मामलों में भी 97 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है। हालांकि, 2025 में एक हजार से ज्यादा मामले सामने आना बताता है कि बीमारी का गंभीर स्वरूप अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
2026 में 9 जिलों में अब तक कोई केस नहीं
जुलाई तक के जिला-वार आंकड़ों में 583 मामले दर्ज हुए हैं। वहीं जानकारी के अनुसार नौ जिलों में अभी तक कोई पॉजिटिव मलेरिया केस दर्ज नहीं हुआ है। इनमें बुरहानपुर, देवास, नर्मदापुरम, हरदा, राजगढ़, विदिशा, उमरिया, निवाड़ी और पांढुर्णा शामिल हैं। इससे यह भी सामने आता है कि प्रदेश में मलेरिया का संक्रमण अब सीमित क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है।
