केंद्र से तालमेल जरूरी: हरसिमरत के बयान से ढाई दशक पुराने गठजोड़ की वापसी के आसार, क्या साथ आएंगे पुराने साथी
अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने 1997 के विधानसभा चुनाव में 93 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसमें अकाली दल की 75 और भाजपा की 18 सीटें शामिल थीं। 2007 में दोनों दलों ने 68 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के गठबंधन की सुगबुगाहट तेज होने लगी है। संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की 41वीं पुण्यतिथि पर आयोजित रैली में हरसिमरत कौर बादल के बयान ने इन चर्चाओं को बल दिया है।
हरसिमरत ने सीधे तौर पर भाजपा का नाम नहीं लिया लेकिन उनके शब्दों को एक बड़े राजनीतिक फैसले की आहट माना जा रहा है। उन्होंने दिल्ली के साथ तालमेल और समझौते की जरूरत पर जोर दिया। यह संकेत दिया कि पंजाब के विकास के लिए केंद्र के साथ बेहतर संबंध जरूरी हैं।
उनके बयान ने उन अटकलों को हवा दी है कि 2020 में अलग हुए दोनों पुराने सहयोगी फिर किसी राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ सकते हैं। अकाली दल और भाजपा का गठबंधन पंजाब की राजनीति में करीब ढाई दशक तक एक मजबूत चुनावी समीकरण रहा है। यह गठबंधन 1997 से 2012 के दौर में अकाली दल के लिए सत्ता तक पहुंचने का मजबूत चुनावी फॉर्मूला साबित हुआ।
अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने 1997 के विधानसभा चुनाव में 93 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसमें अकाली दल की 75 और भाजपा की 18 सीटें शामिल थीं। 2007 में दोनों दलों ने 68 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की। अकाली दल ने 49 और भाजपा ने 19 सीटें जीती थीं। 2012 का चुनाव इस गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण रहा।
गठबंधन ने कुल 68 सीटों के साथ लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। राज्य के पुनर्गठन के बाद यह पहली बार था कि कोई सत्तारूढ़ गठबंधन लगातार दूसरी बार जीता था। 2017 में इस राजनीतिक समीकरण की चमक फीकी पड़ गई। अकाली दल को 15 और भाजपा को तीन सीटें मिलीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों ने मिलकर चार सीटें जीतीं। सितंबर 2020 में कृषि कानून विवाद के कारण अकाली दल ने भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए से अलग होने का फैसला किया।