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साक्षात्कार: दास्तां-ए-मोहब्बत में फासले, इंतजार और इंकलाब है एक लम्हा जिंदगी; जूही बब्बर से विशेष बातचीत
Mon, 24 Aug 2026 02:37 PM IST
Dhirendra Singh
ममता त्रिपाठी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
ममता त्रिपाठी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Mon, 24 Aug 2026 02:37 PM IST
अभिनेत्री जूही बब्बर सोनी ने नाटक एक लम्हा जिंदगी में अपने नाना-नानी की प्रेम कहानी को मंच पर जीवंत किया, जिसमें जुदाई, संघर्ष और देशप्रेम के बीच मोहब्बत की जीत दिखाई गई है। आगरा में अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि दौर बदल सकता है, लेकिन सच्चे प्रेम का एहसास कभी नहीं बदलता।
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जूही बब्बर
- फोटो : अमर उजाला
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दूरियां रास्ते की हों या समय की...अगर मोहब्बत सच्ची हो तो दिल कभी जुदा नहीं होते। कुछ ऐसा ही संदेश देता है नाटक एक लम्हा जिंदगी (ए लव स्टोरी 1938-1979)। दिग्गज वामपंथी विचारक सज्जाद जहीर और मशहूर लेखिका रजिया सज्जाद जहीर के पाक प्रेम को मशहूर अदाकारा जूही बब्बर सोनी ने शनिवार को सूरसदन के मंच पर साकार किया। अमर उजाला से खास बातचीत में जूही ने कहा है कि वक्त चाहे कितना भी बदल जाए, लेकिन प्यार और उसका एहसास हर देश-काल और परिस्थिति में एक सा ही होता है।
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जूही बताती हैं कि वैसे तो ये उनके नाना और नानी की प्रेम कहानी है लेकिन यह खास इसलिए है क्योंकि ये उस दौर में पनपा इश्क था जिसमें गुलामी का दंश था और राजनीतिक अलगाव। बरसों की जुदाई और विपरीत परिस्थितियों में एक महिला का संघर्ष भी। तूफानों से लड़कर भी उन्होंने अपना इश्क मुकम्मल किया। बताती हैं कि नाटक में मिर्जा गालिब और फैज जैसे दिग्गज शायरों की नज्मों की मदद से जज्बातों को अल्फाज में कुछ यूं पिरोया गया है।
''रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जब आंख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है''
''रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जब आंख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है''
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जेन-जी बहुत समझदार
मौजूदा समय में इस ऐतिहासिक प्रेम कहानी को जेन-जी किस तरह से लेते हैं। इस सवाल पर कहती हैं कि जेन-जी बहुत समझदार है। उनका एक्सपोजर बहुत है। किसी भी जानकारी को एक क्लिक में पा लेते हैं। उनके काम करने का अंदाज निराला है और प्रेम को वह न केवल शिद्दत से महसूस करते हैं बल्कि निभाते भी हैं। बताती हैं कि शो के बाद अक्सर युवा उनसे इस अनूठी प्रेम कहानी को उन तक लाने के लिए आभार भी जताते हैं।
मौजूदा समय में इस ऐतिहासिक प्रेम कहानी को जेन-जी किस तरह से लेते हैं। इस सवाल पर कहती हैं कि जेन-जी बहुत समझदार है। उनका एक्सपोजर बहुत है। किसी भी जानकारी को एक क्लिक में पा लेते हैं। उनके काम करने का अंदाज निराला है और प्रेम को वह न केवल शिद्दत से महसूस करते हैं बल्कि निभाते भी हैं। बताती हैं कि शो के बाद अक्सर युवा उनसे इस अनूठी प्रेम कहानी को उन तक लाने के लिए आभार भी जताते हैं।
पढ़ना बेहद जरूरी है
नई पीढ़ी मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर व्यस्त रहती है। किताब और समाचार पत्र पढ़ने की आदत क्यों लोगों में खत्म होती जा रही है। इस सवाल पर जूही का कहना है कि हमें लगातार अपने बच्चों को प्रेरित करना होगा। ये पीढ़ी दोनों काम साथ कर सकती है। अपनी बात को मां नादिरा बब्बर के शब्दों में कुछ इस अंदाज में बयां किया...
'किताबों से जो खुशबू आती है कागज की, वो कितनी अच्छी होती है।
वो आपके कपड़ों और जिस्म को नहीं बल्कि रूह को महका देती है।।'
नई पीढ़ी मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर व्यस्त रहती है। किताब और समाचार पत्र पढ़ने की आदत क्यों लोगों में खत्म होती जा रही है। इस सवाल पर जूही का कहना है कि हमें लगातार अपने बच्चों को प्रेरित करना होगा। ये पीढ़ी दोनों काम साथ कर सकती है। अपनी बात को मां नादिरा बब्बर के शब्दों में कुछ इस अंदाज में बयां किया...
'किताबों से जो खुशबू आती है कागज की, वो कितनी अच्छी होती है।
वो आपके कपड़ों और जिस्म को नहीं बल्कि रूह को महका देती है।।'
आगरा ने परिवार को दी बेपनाह मोहब्बत
जूही बब्बर आगरा के प्रति अपने लगाव को जाहिर करना नहीं भूलीं। कहती हैं, पापा के इलेक्शन हों या फिर उनकी जनसभा, बचपन से ही आगरा आना-जाना लगा रहता था। मां से जहां मैंने रंगमंच की बारीकियां सीखीं तो वहीं पिता राज बब्बर ने सिखाया कि कैसे अपने शहर और शहरवासियों के दिलों में जगह बनाई जाती है। पिता के कहने पर वो ताजगंज स्थित कुष्ठ सेवा सदन भी गईं। वहां रहने वाले मरीजों के साथ वक्त बिताया और फलदार पौधे भी लगाए।
जूही बब्बर आगरा के प्रति अपने लगाव को जाहिर करना नहीं भूलीं। कहती हैं, पापा के इलेक्शन हों या फिर उनकी जनसभा, बचपन से ही आगरा आना-जाना लगा रहता था। मां से जहां मैंने रंगमंच की बारीकियां सीखीं तो वहीं पिता राज बब्बर ने सिखाया कि कैसे अपने शहर और शहरवासियों के दिलों में जगह बनाई जाती है। पिता के कहने पर वो ताजगंज स्थित कुष्ठ सेवा सदन भी गईं। वहां रहने वाले मरीजों के साथ वक्त बिताया और फलदार पौधे भी लगाए।