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Aligarh News: एक्शन मोड में एएमयू, अफसरों को दिखाए पुराने नक्शे तो प्रशासन ने खींचे हाथ
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एएमयू।
- फोटो : Archive
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नगर निगम और एएमयू के बीच 500 करोड़ रुपये की 3.76 हेक्टेयर जमीन के विवाद में शुक्रवार को एएमयू के प्रॉक्टर प्रो. मो. नवेद संपत्ति अधिकारी के साथ जिलाधिकारी से मिलने पहुंचे। जमीन से जुड़े दशकों पुराने दस्तावेजी सबूत उनके सामने रख दिए। एएमयू प्रशासन के तेवरों और पेश किए गए अभिलेखों को देखते हुए जिला प्रशासन ने तुरंत मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
जिलाधिकारी अविनाश कुमार ने साफ कर दिया है कि जब तक कागजों की पूरी जांच नहीं हो जाती, तब तक जमीन पर किसी भी पक्ष का स्वामित्व नहीं माना जाएगा। मौके पर यथास्थिति बनी रहेगी, यानी जिसका कब्जा जैसा चलता आ रहा था, वही रहेगा।
जिलाधिकारी ने बताया कि एएमयू ने अपने दावों के समर्थन में कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज दिखाए हैं। एएमयू का तर्क है कि 1990 के आसपास यह जमीन कागजों में बंजर दर्ज हो गई थी, जिसे दुरुस्त कराने के लिए उन्होंने पहले से ही अभिलेखीय सुधार का वाद दायर कर रखा है।
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अब एसडीएम को दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर साक्ष्य मांगने के निर्देश दिए गए हैं। दोनों संस्थाएं अदालत में अपने-अपने दस्तावेज पेश करेंगी, जिसके आधार पर ही अंतिम मालिकाना हक तय होगा।
1925 की डीड हमारे पास... बोर्ड लगाने से जमीन उनकी नहीं हो जाती
जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे एएमयू के प्रॉक्टर प्रो. मोहम्मद नवेद ने नगर निगम की कार्रवाई पर दो टूक कहा कि किसी के घर के आगे जबरन अपना बोर्ड टांग देने से, वह घर बोर्ड लगाने वाले का नहीं हो जाता।
प्रॉक्टर प्रो. नवेद ने मीडिया से बातचीत में बताया कि जमीन पर कब्जा और स्वामित्व हमेशा से एएमयू का ही रहा है। उन्होंने कहा, हमारे पास 1925 की डीड मौजूद है, जब तत्कालीन सरकार ने यह जमीन एएमयू को सौंपी थी। यह संभव ही नहीं है कि सरकार एक बार एएमयू को जमीन दे और बाद में कोई दूसरा विभाग उठकर उस पर अपना हक जताने लगे। कुछ दशकों पहले निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों की लापरवाही से रिकॉर्ड में जो गलतियां हुईं, उसी का फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है।
प्रॉक्टर ने खुलासा किया कि नगर निगम ने तो पिछले साल ही जमीन पर अपना दावा जताया है, जबकि एएमयू प्रशासन वर्ष 2002 से ही रिकॉर्ड दुरुस्त कराने के लिए लगातार आवेदन कर रहा है। जून 2025 से भी एक नया आवेदन लंबित है। यह पूरा मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में है और इसी आधार पर अब दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने के नोटिस दिए जा रहे हैं।
एएमयू में क्राइम ग्राफ गिरा, नए थाने की कोई जरूरत नहीं
विवादित स्थल पर नया थाना बनाए जाने की चर्चाओं और बोर्ड को लेकर प्रॉक्टर प्रो. नवेद ने स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि थाना प्रस्तावित करने या बनाने की एक कानूनी प्रक्रिया होती है। प्रस्तावित थाने का बोर्ड नगर निगम ने नहीं लगाया था। एएमयू परिसर और आसपास के इलाकों में बीते वर्षों में क्राइम ग्राफ में भारी गिरावट आई है। ऐसे में फिलहाल यहां किसी नए पुलिस थाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। जकारिया मार्केट (मेडिकल रोड) पर पहले से ही पुलिस चौकी स्थापित है, जो एएमयू की जमीन पर ही बनी है और सुरक्षा के लिहाज से पूरी तरह पर्याप्त है।
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जिलाधिकारी अविनाश कुमार ने साफ कर दिया है कि जब तक कागजों की पूरी जांच नहीं हो जाती, तब तक जमीन पर किसी भी पक्ष का स्वामित्व नहीं माना जाएगा। मौके पर यथास्थिति बनी रहेगी, यानी जिसका कब्जा जैसा चलता आ रहा था, वही रहेगा।
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जिलाधिकारी ने बताया कि एएमयू ने अपने दावों के समर्थन में कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज दिखाए हैं। एएमयू का तर्क है कि 1990 के आसपास यह जमीन कागजों में बंजर दर्ज हो गई थी, जिसे दुरुस्त कराने के लिए उन्होंने पहले से ही अभिलेखीय सुधार का वाद दायर कर रखा है।
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अब एसडीएम को दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर साक्ष्य मांगने के निर्देश दिए गए हैं। दोनों संस्थाएं अदालत में अपने-अपने दस्तावेज पेश करेंगी, जिसके आधार पर ही अंतिम मालिकाना हक तय होगा।
1925 की डीड हमारे पास... बोर्ड लगाने से जमीन उनकी नहीं हो जाती
जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे एएमयू के प्रॉक्टर प्रो. मोहम्मद नवेद ने नगर निगम की कार्रवाई पर दो टूक कहा कि किसी के घर के आगे जबरन अपना बोर्ड टांग देने से, वह घर बोर्ड लगाने वाले का नहीं हो जाता।
प्रॉक्टर प्रो. नवेद ने मीडिया से बातचीत में बताया कि जमीन पर कब्जा और स्वामित्व हमेशा से एएमयू का ही रहा है। उन्होंने कहा, हमारे पास 1925 की डीड मौजूद है, जब तत्कालीन सरकार ने यह जमीन एएमयू को सौंपी थी। यह संभव ही नहीं है कि सरकार एक बार एएमयू को जमीन दे और बाद में कोई दूसरा विभाग उठकर उस पर अपना हक जताने लगे। कुछ दशकों पहले निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों की लापरवाही से रिकॉर्ड में जो गलतियां हुईं, उसी का फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है।
प्रॉक्टर ने खुलासा किया कि नगर निगम ने तो पिछले साल ही जमीन पर अपना दावा जताया है, जबकि एएमयू प्रशासन वर्ष 2002 से ही रिकॉर्ड दुरुस्त कराने के लिए लगातार आवेदन कर रहा है। जून 2025 से भी एक नया आवेदन लंबित है। यह पूरा मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में है और इसी आधार पर अब दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने के नोटिस दिए जा रहे हैं।
एएमयू में क्राइम ग्राफ गिरा, नए थाने की कोई जरूरत नहीं
विवादित स्थल पर नया थाना बनाए जाने की चर्चाओं और बोर्ड को लेकर प्रॉक्टर प्रो. नवेद ने स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि थाना प्रस्तावित करने या बनाने की एक कानूनी प्रक्रिया होती है। प्रस्तावित थाने का बोर्ड नगर निगम ने नहीं लगाया था। एएमयू परिसर और आसपास के इलाकों में बीते वर्षों में क्राइम ग्राफ में भारी गिरावट आई है। ऐसे में फिलहाल यहां किसी नए पुलिस थाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। जकारिया मार्केट (मेडिकल रोड) पर पहले से ही पुलिस चौकी स्थापित है, जो एएमयू की जमीन पर ही बनी है और सुरक्षा के लिहाज से पूरी तरह पर्याप्त है।