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Pithoragarh News: गोरी में बनेगा पक्का पुल, सिर्फ पढ़ाई का इम्तिहान देंगे बच्चे
Sun, 23 Aug 2026 11:31 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 23 Aug 2026 11:31 PM IST
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बंगापानी (पिथौरागढ़)। 13 साल से जान जोखिम में डालकर गरारी के सहारे गोरी नदी पार करने की मजबूरी से घुरुड़ी और मनकोट के ग्रामीणों और विद्यार्थियों को निजात मिलने की उम्मीद जगी है। मोरी में गोरी नदी पर गरारी की जगह पक्का पुल बनाने की कवायद शुरू हुई है। इसके लिए सर्वे शुरू हुआ है। हालांकि कुछ रोज पूर्व हुए भूस्खलन से गरारी तक पहुंचने का एकमात्र पैदल रास्ता भी पूरी तरह बंद हो गया है।
मोरी में गोरी नदी पर बना पक्का पुल वर्ष 2013 की आपदा में बह गया था। सिस्टम ने यहां नया पक्का पुल बनाना उचित नहीं समझा और गरारी लगाकर जिम्मेदारी निभा दी। तब से दोनों गांवों के विद्यार्थी और ग्रामीण गरारी के सहारे जान जोखिम में डालकर उफनती गोरी नदी पार करने के लिए मजबूर हैं। तब से लेकर आज तक विद्यार्थी अपने भविष्य के सपने को साकार करने के लिए रोजाना अपने हौसले का इम्तिहान दे रहे हैं। सालों पहले इस स्थान पर पक्का पुल स्वीकृत हुआ लेकिन इसके निर्माण के लिए जिम्मेदार आगे नहीं आए। विद्यार्थियों की इस परेशानी और सिस्टम की लापरवाही को अमर उजाला ने बीते सात जुलाई के अंक में उफनती गोरी रोज लेती है हिम्मत का इम्तिहान, शीर्षक से प्रकाशित किया था।
खबर का संज्ञान लेकर पीएमजीएसवाई ने पक्के पुल के निर्माण की कवायद शुरू कर दी है। टीम पुल का सर्वे करने मोरी पहुंची। ऐसे में उम्मीद है कि जल्द वहां पुल का निर्माण शुरू होगा और इसके बनने के बाद विद्यार्थियों और ग्रामीणों के लिए खतरा कम होगा।
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40 से अधिक बच्चे मोल लेते हैं गरारी से नदी पार करने का खतरा
बंगापानी। मवानी दवानी के तोक घुरुड़ी और मनकोट के 40 से अधिक विद्यार्थियों को स्कूल पहुंचने के लिए रोजाना गोरी नदी पार करनी पड़ती है। पक्का पुल न होने से गरारी खींचना उनके लिए मजबूरी है। हालात यह है कि अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें गोरी नदी तक छोड़ने और लाने भी जाना पड़ता है। कई बार गरारी नदी के बीचोबीच अटकती है तो बच्चों को सुरक्षित निकालना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। वहीं कुछ रोज पूर्व हुए भूस्खलन ने बच्चों और अभिभावकों से गरारी का सहारा भी दूर कर दिया है। भूस्खलन से गरारी तक पहुंचने का एकमात्र पैदल रास्ता ध्वस्त कर दिया है, जिससे ग्रामीणों के सामने एक नई मुसीबत आ गई है।
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मवानी दवानी क्षेत्र में सड़क का सर्वे कार्य किया जा रहा है। वहीं मोरी में गोरी नदी पर पक्का पुल भी बनाया जाएगा। सर्वे पूरा होते ही डीपीआर तैयार कर शासन को भेजी जाएगी। शासन से ही इसके निर्देश मिले हैं।
राकेश सिंह कार्की, जेई, पीएमजीएसवाई, धारचूला
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मोरी में गोरी नदी पर बना पक्का पुल वर्ष 2013 की आपदा में बह गया था। सिस्टम ने यहां नया पक्का पुल बनाना उचित नहीं समझा और गरारी लगाकर जिम्मेदारी निभा दी। तब से दोनों गांवों के विद्यार्थी और ग्रामीण गरारी के सहारे जान जोखिम में डालकर उफनती गोरी नदी पार करने के लिए मजबूर हैं। तब से लेकर आज तक विद्यार्थी अपने भविष्य के सपने को साकार करने के लिए रोजाना अपने हौसले का इम्तिहान दे रहे हैं। सालों पहले इस स्थान पर पक्का पुल स्वीकृत हुआ लेकिन इसके निर्माण के लिए जिम्मेदार आगे नहीं आए। विद्यार्थियों की इस परेशानी और सिस्टम की लापरवाही को अमर उजाला ने बीते सात जुलाई के अंक में उफनती गोरी रोज लेती है हिम्मत का इम्तिहान, शीर्षक से प्रकाशित किया था।
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खबर का संज्ञान लेकर पीएमजीएसवाई ने पक्के पुल के निर्माण की कवायद शुरू कर दी है। टीम पुल का सर्वे करने मोरी पहुंची। ऐसे में उम्मीद है कि जल्द वहां पुल का निर्माण शुरू होगा और इसके बनने के बाद विद्यार्थियों और ग्रामीणों के लिए खतरा कम होगा।
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40 से अधिक बच्चे मोल लेते हैं गरारी से नदी पार करने का खतरा
बंगापानी। मवानी दवानी के तोक घुरुड़ी और मनकोट के 40 से अधिक विद्यार्थियों को स्कूल पहुंचने के लिए रोजाना गोरी नदी पार करनी पड़ती है। पक्का पुल न होने से गरारी खींचना उनके लिए मजबूरी है। हालात यह है कि अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें गोरी नदी तक छोड़ने और लाने भी जाना पड़ता है। कई बार गरारी नदी के बीचोबीच अटकती है तो बच्चों को सुरक्षित निकालना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। वहीं कुछ रोज पूर्व हुए भूस्खलन ने बच्चों और अभिभावकों से गरारी का सहारा भी दूर कर दिया है। भूस्खलन से गरारी तक पहुंचने का एकमात्र पैदल रास्ता ध्वस्त कर दिया है, जिससे ग्रामीणों के सामने एक नई मुसीबत आ गई है।
मवानी दवानी क्षेत्र में सड़क का सर्वे कार्य किया जा रहा है। वहीं मोरी में गोरी नदी पर पक्का पुल भी बनाया जाएगा। सर्वे पूरा होते ही डीपीआर तैयार कर शासन को भेजी जाएगी। शासन से ही इसके निर्देश मिले हैं।
राकेश सिंह कार्की, जेई, पीएमजीएसवाई, धारचूला