Indian NRI: अमेरिकन ड्रीम की चमक के पीछे दर्द; एनआरआई बोले- अमेरिका आने से पहले सोचें, भारत में बेहतर अवसर
अमेरिका में करियर और बेहतर जिंदगी का सपना देखने वाले भारतीय युवाओं के लिए कुछ एनआरआई ने अलग तस्वीर सामने रखी है। सुहास और प्रियंका ने विदेश में परिवार से दूरी और अपनापन न मिलने का दर्द बताया। वहीं मधुर मेहता ने वीजा की अनिश्चितता और मानसिक दबाव की बात कही। क्या अमेरिका का सपना उतना आसान है, जितना सोशल मीडिया पर नजर आता है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अमेरिका में करियर बनाने और वहां बसने का सपना लाखों भारतीय युवाओं के मन में रहता है। बेहतर नौकरी, ज्यादा कमाई और सुविधाओं के कारण युवा विदेश जाने की तैयारी करते हैं। लेकिन अमेरिका में रह रहे कुछ भारतीय मूल के लोगों ने अब इस सपने का दूसरा पहलू बताया है। उनका कहना है कि विदेश में अच्छी नौकरी मिलने के बावजूद परिवार से दूरी, वीजा की चिंता और अकेलापन जिंदगी को मुश्किल बना सकता है। कुछ लोगों की सलाह है कि भारत में भी अब करियर के अच्छे अवसर तलाशे जा सकते हैं।
सुहास और प्रियंका ने विदेश में रहने को लेकर क्या कहा?
भारतीय मूल के दो प्रवासी युवा सुहास और प्रियंका ने सोशल मीडिया पर साझा एक वीडियो में विदेश में रहने के अपने अनुभव बताए। उन्होंने कहा कि विदेश में रहने की सबसे बड़ी कीमत परिवार और दोस्तों से दूर होना है। सुहास ने कहा कि अमेरिका में कई साल बिताने के बाद भी उन्हें वहां पूरी तरह अपनापन महसूस नहीं हुआ। उनका कहना है कि अगर मौका मिले तो वह भारत लौटकर यहीं रहना पसंद करेंगे। दोनों ने यह भी कहा कि आज भारत में करियर आगे बढ़ाने के लिए कई संभावनाएं और सुविधाएं मौजूद हैं।
क्या सोशल मीडिया अमेरिका की जिंदगी की पूरी तस्वीर दिखाता है?
अमेरिका में रहने वाले 35 वर्षीय मधुर मेहता ने भी अपनी जिंदगी का अनुभव साझा किया। वह सिएटल की एक तकनीकी कंपनी में प्रोग्राम मैनेजर हैं। उनके मुताबिक, उन्होंने जिस सपनों जैसी जिंदगी की कल्पना की थी, असल जिंदगी उससे काफी अलग निकली। वीजा की अनिश्चितता के कारण वह न तो घर खरीद पा रहे हैं और न ही भविष्य की पक्की योजना बना पा रहे हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें देखकर लोगों को लगता होगा कि उनकी जिंदगी शानदार है, लेकिन वह तस्वीर सच्चाई का सिर्फ आधा हिस्सा है।
वीजा की चिंता ने क्यों बढ़ाया मानसिक दबाव?
मधुर 2021 में मास्टर्स डिग्री के लिए अमेरिका आए थे। उनका लक्ष्य स्थिर करियर बनाना, अच्छी कंपनी में काम करना और भारत में अपने परिवार की मदद करना था। पांच साल बाद उन्होंने अमेजन जैसी कंपनी में प्रोग्राम मैनेजर का पद हासिल किया, लेकिन इसके साथ भावनात्मक दबाव भी बढ़ा। उनका कहना है कि परिवार से हजारों किलोमीटर दूर रहने और वीजा की अनिश्चितता ने उनकी जिंदगी को लगातार संघर्ष में रखा है। एच-1बी वीजा मिलने से उन्हें कुछ राहत मिली, लेकिन भविष्य में नियम बदलने की चिंता बनी रहती है।
क्या भारत लौटने का विकल्प अब युवाओं को बेहतर लग रहा है?
मधुर और उनकी मंगेतर कनाडा या यूरोप जाने के विकल्प पर भी विचार करते हैं, क्योंकि उन्हें वहां वीजा नियम अपेक्षाकृत स्थिर लगते हैं। हालांकि, एक देश में कई साल बिताने के बाद सब कुछ छोड़कर दूसरी जगह से जिंदगी शुरू करना उनके लिए आसान नहीं है। वहीं सुहास और प्रियंका का अनुभव बताता है कि विदेश जाने का फैसला सिर्फ नौकरी और कमाई देखकर नहीं किया जा सकता। परिवार, मानसिक सुकून, भविष्य की स्थिरता और अपनेपन को भी इसमें शामिल करना जरूरी है।
क्या अमेरिकी ड्रीम की कीमत अब भारतीय युवाओं को दोबारा सोचने पर मजबूर कर रही है?
अमेरिका में नौकरी और बेहतर आय अब भी भारतीय युवाओं के लिए बड़ा आकर्षण है। लेकिन इन अनुभवों से यह सवाल जरूर उठता है कि विदेश जाने से पहले सिर्फ वेतन और जीवनशैली को देखना कितना सही है। वीजा नियमों में बदलाव, परिवार से दूरी और अकेलेपन जैसी चुनौतियां लंबे समय तक असर डाल सकती हैं। ऐसे में अमेरिका जाने का सपना देखने वाले युवाओं के सामने एक नया सवाल खड़ा है कि क्या भारत में रहकर उपलब्ध अवसरों को आजमाना ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है।