अपना ही चोट दे के कोई जब चला गया
इल्ज़ाम मेरे ज़ख़्म का मुझ पर ही आ गया
फिर दूसरी किताब में मेरा न दिल लगा
या'नी तुम्हारे बाद भी तुम को पढ़ा गया
जीने की मेरे वज्ह कोई भी नहीं रही
तू आख़िरी उमीद था तू भी चला गया
तंग आ के ज़िंदगी से मैं मरने पे था ब-ज़िद
इतने में एक हाथ मिरे सर पे आ गया
इक उम्र तेरी जुस्तुजू में मुब्तला रहा
इक उम्र तेरी याद में तन्हा रहा गया
कुछ देर मुझ को ग़ौर से सब देखते रहे
कुछ देर बाद ज़ोर से मुझ को सुना गया
दो-चार दिन ही आँख में आँसू मैं रख सका
दो-चार दिन में हादिसा दिल में समा गया
जो दर्द कह सका न किसी ग़म-गुसार से
सद-शुक्र है कि वो मिरी ग़ज़लों में आ गया
'सोहिल' वो एक शख़्स जो सुनता था हाल-ए-दिल
ना-साज़ हम को जान के छुटकारा पा गया
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