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Explainer: यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए कौन से सवाल, केंद्र को क्यों करना पड़ा पुनर्विचार?

Fri, 21 Aug 2026 07:10 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Fri, 21 Aug 2026 07:10 PM IST
सार
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यूजीसी के 2026 के इक्विटी नियमों का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकना था, लेकिन जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद अब केंद्र इन नियमों पर पुनर्विचार कर रहा है। आइए पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं।

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What Questions Did the Supreme Court Raise Over UGC’s New Rules, and Why Is the Centre Reconsidering Them?
यूजीसी के नियम पर अब पुनर्विचार - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

केंद्र सरकार उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के 2026 के इक्विटी नियमों पर दोबारा विचार कर रही है। ये नियम जनवरी में अधिसूचित हुए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ही दिनों बाद इन पर रोक लगा दी थी। इस पर पुनर्विचार के बारे में केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी। 

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ऐसे में आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? यूजीसी का नया नियम क्या है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? कौन से नियम हैं विवाद में? विवाद की सबसे बड़ी वजह क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों पर रोक क्यों लगाई? पहले के नियम क्या थे?

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ताजा मामला क्या है?

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के 2026 के इक्विटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई की। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि यूजीसी के इन नियमों पर दोबारा विचार किया जा रहा है। इसके बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए आगे बढ़ा दी गई। फिलहाल स्थिति यह है कि 2026 के नियमों पर रोक है, 2012 के नियम लागू हैं।

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यूजीसी का नया नियम क्या है?

13 जनवरी को यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु “यूजीसी समता विनियम 2026” को अधिसूचित किया। इस नियम का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है। यह नियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विकलांग व्यक्तियों को किसी भी तरह के भेदभाव से सुरक्षा देता है। नए नियम को सभी विश्वविद्यालय को लागू करना होगा। इसको कैसे लागू किया जाएगा इसके लिए भी यूजीसी ने एक पूरा खाका तैयार किया है। 

What Questions Did the Supreme Court Raise Over UGC’s New Rules, and Why Is the Centre Reconsidering Them?
क्या है यूजीसी का नया नियम 2026 - फोटो : अमर उजाला

इसमें एससी-एसटी, ओबीसी छात्रों और अध्यापकों के लिए क्या है?

इन नियमों को लागू करने के लिए हर विश्वविद्यालय में एक समान अवसर केंद्र, एक समता समिति और समता समूह बनाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही कई और नियम भी हैं, इन्हें एक-एक करके समझते हैं... 

आरक्षित छात्रों और अध्यापकों की सुरक्षा के लिए नियम: 

समान अवसर केंद्र- प्रत्येक संस्थान को वंचित समूहों के लिए नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी के लिए समान अवसर केंद्र स्थापित करने होंगे। इसमें संस्थान के पांच फैकल्टी सदस्य होंगे। इन पांच सदस्यों के लिए किसी भी कैटेगरी के लिए कोई आरक्षण नहीं है।

समता समिति- समान अवसर केंद्र को एक समता समिति बनानी होगी। इसके अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख होंगे। इसमें  एससी, एसटी, ओबीसी, विकलांगों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अनिवार्य होगा। इस समिति में कुल दस सदस्य होंगे। 

समता समूह- प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान निगरानी रखने तथा परिसर में किसी भी भेदभाव को रोकने के लिए एक छोटी इकाई भी गठित करेगा, जिसे 'समता समूह (इक्विटी स्क्वॉड)' कहा जाएगा। उच्च शिक्षण संस्थान आवश्यक संख्या में समता समूह गठित कर सकता है, और ऐसे समूह गतिशील रहेंगे तथा संवेदनशील स्थानों पर नियमित रूप से निरीक्षण करेंगे। 

विश्वविद्यालय में दाखिले के समय सभी छात्रों को किसी भी तरह के भेदभाव नहीं करने के लिए एक घोषणा-पत्र देना होगा। 

संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रावास आवंटन, कक्षाओं या मेंटरशिप समूहों के चयन में किसी भी तरह का भेदभाव न हो और पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता के साथ हो। छात्रों के लिए 24/7 समता हेल्पलाइन और भेदभाव की रिपोर्ट करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाना होगा। 

प्रत्येक विभाग में 'समता दूत' नियुक्त किए जाएंगे, जो समता के उल्लंघन की सूचना समान अवसर केंद्र को बिना किसी देरी के देंगे। जांच के दौरान पीड़ित या गवाह बने कर्मचारी या अध्यापक को उत्पीड़न या प्रतिशोध के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान की जाएगी। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो यूजीसी उसकी अनुदान सहायता रोक सकता है, उसे डिग्री देने से मना कर सकता है या मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से हटा सकता है।

इसका विरोध क्यों हो रहा है?

नए इन नियमों का पहले सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हुआ। देखते-देखते इसके विरोध में जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे। मामला बढ़ते-बढ़ते सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। यहां इसे चुनौती दी गई है। इन नियमों का विरोध मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के लोगों की तरफ से देखने को मिल रहा है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया, ताकि रेगुलेशन के खिलाफ संगठित विरोध किया जा सके।

कौन से नियम हैं विवाद में?

विवाद 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले यूजीसी नियम, 2026' को लेकर है। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव को रोकना था। लेकिन नियम अधिसूचित होने के करीब दो सप्ताह बाद, 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इनके लागू होने पर रोक लगा दी। अदालत ने इस मामले में केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी किया था।

विवाद की सबसे बड़ी वजह क्या है?

पूरे मामले में सबसे ज्यादा विवाद नियम 3(1)(सी) को लेकर है। इस नियम में ‘जाति आधारित भेदभाव’ की परिभाषा दी गई है। इसके मुताबिक, जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति यानी एससी, अनुसूचित जनजाति यानी एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के सदस्यों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को जाति आधारित भेदभाव माना गया है।

याचिकाकर्ताओं की आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस परिभाषा में सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है। यानी उनका सवाल है कि अगर किसी सामान्य वर्ग के छात्र या शिक्षक के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो क्या उसे भी इस विशेष प्रावधान के तहत सुरक्षा मिलेगी? इसी आधार पर मुख्य रूप से नियम 3(1)(सी) को चुनौती दी गई है।

इनकी आपत्ति यही है कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में एससी, एसटी और ओबीसी का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को इस विशेष सुरक्षा के दायरे में स्पष्ट रूप से नहीं रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों पर रोक क्यों लगाई?

29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों को रोकते हुए कहा था कि पहली नजर में इनके कुछ प्रावधानों में अस्पष्टता दिखाई देती है। अदालत ने यह भी कहा था कि इनके गलत इस्तेमाल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि इस मामले को अगर बिना जांचे छोड़ दिया गया तो इसके बहुत व्यापक परिणाम हो सकते हैं और इससे समाज में विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी वजह से अदालत ने नियमों को फिलहाल लागू न करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कौन-कौन से सवाल उठाए?

1. जाति आधारित भेदभाव की अलग परिभाषा क्यों?
अदालत ने सवाल उठाया कि जब 2026 के नियमों में 'भेदभाव' की पहले से ही व्यापक परिभाषा मौजूद है, तो नियम 3(1)(c) में जाति आधारित भेदभाव की अलग परिभाषा क्यों बनाई गई? कोर्ट यह भी देख रहा है कि क्या यह प्रावधान 2026 के पूरे नियमों के उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा है।

2. एससी, एसटी और ओबीसी के भीतर मौजूद अलग-अलग समुदायों का क्या?
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि एससी, एसटी और ओबीसी के भीतर मौजूद अलग-अलग वर्गों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित होगी। खास तौर पर सवाल यह है कि क्या अत्यंत पिछड़े समुदायों को भेदभाव और सामाजिक नुकसान से पर्याप्त और प्रभावी सुरक्षा मिलती है।

3. हॉस्टल और कक्षाओं में अलग व्यवस्था का क्या मतलब है?
2026 के नियमों में हॉस्टल, कक्षाओं, मार्गदर्शन समूहों या इसी तरह की शैक्षणिक और आवासीय व्यवस्थाओं में अलग व्यवस्था यानी ‘सेग्रीगेशन’ का भी जिक्र है।
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अगर ऐसी अलग व्यवस्था पारदर्शी और भेदभावरहित मानदंडों के आधार पर की जाती है, तो क्या फिर भी यह 'अलग लेकिन बराबर' जैसी स्थिति पैदा कर सकती है? अदालत ने यह भी पूछा कि क्या ऐसी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में दिए गए समानता के अधिकार और संविधान की प्रस्तावना में मौजूद बंधुत्व की भावना के खिलाफ हो सकती है।

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यूजीसी के नियम - फोटो : Amar Ujala

2012 के यूजीसी नियम क्या थे?

2012 के नियमों में उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों को जाति, धर्म, भाषा, नस्ल, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव से बचाने की व्यवस्था थी। इसमें एससी और एसटी छात्रों को भी शामिल किया गया था, लेकिन ओबीसी का विशेष उल्लेख नहीं था। इन नियमों के तहत हर संस्थान में समान अवसर सेल बनाया जाना था, जो भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को देखता था। नियमों में दाखिले, परीक्षा, कक्षा, हॉस्टल, मेस और रैगिंग जैसी स्थितियों में भेदभाव रोकने के प्रावधान भी थे।

अगर 2012 में नियम मौजूद थे तो नए नियम लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

यूजीसी के मुताबिक, इन नियमों को लागू करने के पीछे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मकसद को पूरा करना है। यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उस दृष्टिकोण पर आधारित है जो 'पूर्ण समता और समावेशन' को सभी शैक्षिक निर्णयों की आधारशिला मानता है।

यूजीसी का कहना है कि इन नियमों से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि वंचित छात्र शिक्षा प्रणाली में बिना किसी डर के बेहतर प्रदर्शन कर सकें। इन नियमों का प्राथमिक उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति , सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव को खत्म करना है। 

ये नियम राधिका वेमुला और आबिदा सलीम तड़वी द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद तैयार किए गए हैं। इन दोनों ने अपने बच्चों को कॉलेज में जाति-आधारित भेदभाव के कारण खो दिया था। समर्थकों का तर्क है कि ऐसे नियम भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए जरूरी हैं। ये घटनाएं 2016 और 2019 में हुई थी। 

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जातिगत भेदभाव के आंकड़े - फोटो : Amar Ujala

शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव के आंकड़े

यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट में  यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जाति के आधार पर भेदभाव की शिकायतों कों लेकर एक डाटा दिया था। इस डाटा में 2019 से 2024 तक के आंकड़ें दिए गए थे।

  • इस रिपोर्ट में सामने आया कि पांच वर्षों में लगातार शिकायतों के आंकड़े 118.4 प्रतिशत बढ़े। 
  • 2019-20 और 2023-24 के बीच, यूजीसी को 704 यूनिवर्सिटी और 1,553 कॉलेजों में समान अवर सेल और एससी/एसटी सेल से 1,160 शिकायतें मिलीं।
  • 1,052 शिकायतों में 90.68% को निपटा लिया गया था। हालांकि, पेंडिंग मामलों की संख्या 2019-20 में 18 से बढ़कर 2023-24 में 108 हो गई।
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